डायबिटीज (Diabetes) क्या है: प्रकार, जांच और भारतीय घरों में रोज़ की देखभाल

डायबिटीज में खून का ग्लूकोज़ लगातार ज़्यादा रहता है, क्योंकि पैंक्रियास कम इंसुलिन बनाता है या शरीर उसे ठीक से इस्तेमाल नहीं कर पाता; सबसे आम टाइप 2 है [1]। भारत में लगभग 11% वयस्कों को डायबिटीज है, 15% को प्रीडायबिटीज [2]। ब्लड टेस्ट इसे पकड़ता है; खाना, एक्टिविटी, वज़न और डॉक्टर की दवाएं इसे संभालती हैं [1] [3]।

मुख्य बातें

  • लगभग हर चार में से एक वयस्क: भारत में 11% वयस्कों को डायबिटीज है और 15% को प्रीडायबिटीज [2]।
  • यहां यह जल्दी शुरू होती है: भारतीयों में टाइप 2 दूसरे बड़े नस्लीय समूहों के मुकाबले कम से कम दस साल पहले शुरू होती है, इसलिए 30 साल से ऊपर हर किसी को जांच की सलाह है [3]।
  • रिपोर्ट की वह लाइन: खाली पेट प्लाज़्मा ग्लूकोज़ 126 mg/dl या उससे ज़्यादा, या HbA1c 6.5% या उससे ज़्यादा, और दूसरे टेस्ट से पुष्टि, यानी डायबिटीज [3]।
  • टाइप 2 में बचाव सच में मुमकिन है: एक भारतीय ट्रायल में बढ़ी हुई शुगर वाले लोगों को लाइफ़स्टाइल की सलाह मिली, तो नए केस 28.5% कम हुए [4]।
  • गुड़ और शहद भी शुगर हैं: गुड़, शहद और चीनी, तीनों शुगर ही गिने जाते हैं, और संयम से, थोड़े समय के लिए, एक स्वीटनर चम्मच भर चीनी की जगह ले सकता है [3] [5] [6]।
इस पेज पर
  1. डायबिटीज क्या है?
  2. भारत में डायबिटीज कितनी आम है?
  3. डायबिटीज के प्रकार
  4. भारतीयों को यह जल्दी क्यों होती है?
  5. जांच कैसे होती है? रिपोर्ट के नंबर और शुगर लेवल कितना होना चाहिए
  6. डायबिटीज से बचाव कैसे करें: एक भारतीय ट्रायल ने क्या पाया
  7. रोज़ डायबिटीज कैसे कंट्रोल करें
  8. सालों तक ज़्यादा शुगर क्या करती है, और हर साल की जांच
  9. मिठास की जगह कहां है: चाय, मिठाई, गुड़ और स्वीटनर
  10. हमारी गाइड, इस क्रम में पढ़िए
  11. आपकी रसोई के लिए छोटा सार

यह गाइड डायबिटीज को आम तौर पर समझाती है। आपकी रिपोर्ट आपके डॉक्टर जानते हैं; खाना, एक्टिविटी या दवा बदलने से पहले उनसे बात करें।

डायबिटीज क्या है?

कई घरों में इसे "शुगर की बीमारी" कहते हैं, और फ़ोन पर लोग सर्च करते हैं "diabetes kya hai"। जवाब सीधा है।

डायबिटीज वह स्थिति है जिसमें खून का ग्लूकोज़ अपनी सामान्य सीमा से ऊपर रहता है, क्योंकि पैंक्रियास बहुत कम इंसुलिन बनाता है, या शरीर अपने बनाए इंसुलिन का इस्तेमाल नहीं कर पाता [1]। इंसुलिन वह हार्मोन है जो ग्लूकोज़ को खून से निकालकर कोशिकाओं (सेल्स) तक पहुंचाता है [1]।

रसोई से समझिए। हर रोटी, चावल की हर कटोरी और चाय में डाली हर चम्मच चीनी टूटकर ग्लूकोज़ बनती है और खून में जाती है। इंसुलिन वह चाबी है जो कोशिकाओं का ताला खोलती है, ताकि ग्लूकोज़ अंदर जाकर काम आ सके।

डायबिटीज में या तो चाबी नहीं है, या ताला जाम हो गया है। दोनों हालत में ग्लूकोज़ खून में ही रह जाता है, और रिपोर्ट का नंबर चढ़ता जाता है।

पूरा तरीका बस इतना है, और इस पेज की बाकी हर बात समझने के लिए यह काफ़ी है। सालों तक ज़्यादा रहने पर यह अतिरिक्त ग्लूकोज़ खून की नलियों को घिसता है; लंबे समय के नुकसान वाला हिस्सा बताता है कि यह कहां दिखता है और कौन सी जांच इसे जल्दी पकड़ती है [1]।

कुल मिलाकर: यह आम है, ब्लड टेस्ट से पकड़ में आती है, और इसे ज़िंदगी भर, हर खाने के साथ संभाला जाता है।

भारत में डायबिटीज कितनी आम है?

किसी भी शादी में बैठकर गिन लीजिए। एक चाचा जो गुलाब जामुन से मना कर देते हैं, एक बुआ जो दाल के साथ अपनी गोली लेती हैं, एक कज़िन जिसे अभी-अभी "ध्यान रखने" को कहा गया है। ऐसा लगता है जैसे सबको है।

तो सच में, यह कितनी आम है?

हाल के राष्ट्रीय सर्वे में 20 साल और उससे ऊपर के 11.4% भारतीय वयस्कों को डायबिटीज थी और 15.3% को प्रीडायबिटीज, यानी लगभग हर चार में से एक वयस्क को इनमें से कोई एक [2]।

सर्वे का फ़ील्डवर्क 2008 से 2020 के बीच राज्य दर राज्य हुआ, इसलिए इसे आज की गिनती नहीं, सबसे ताज़ा राष्ट्रीय तस्वीर की तरह पढ़िए [2]।

इस आंकड़े का दूसरा हिस्सा ज़्यादा सोचने लायक है। कई कम विकसित राज्यों में प्रीडायबिटीज खुद डायबिटीज से ज़्यादा आम थी: बहुत से लोग जो अभी बीमार नहीं हैं, पर जिन पर जोखिम ज़्यादा है [2] [1]।

इसीलिए यह पेज बचाव और जांच पर उतना ही समय देता है जितना डायबिटीज के साथ जीने पर। जिसे इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है, हो सकता है उसका अभी डायग्नोसिस ही न हुआ हो।

हमने यह पेज इसी वजह से लिखा। हमारे अपने खरीदारों के सर्वे में 59% ने कहा कि घर में कोई न कोई ब्लड शुगर पर नज़र रखता है [7]।

कुल मिलाकर: अगर आपने कभी शुगर की जांच नहीं करवाई, तो आप अकेले नहीं हैं; अगले हिस्से बताते हैं कि जांच कब करवानी है।

डायबिटीज के प्रकार

बातचीत में चार तरह की डायबिटीज सामने आती है: टाइप 1, टाइप 2, टाइप 2 से पहले का बढ़ी हुई शुगर वाला दौर, और प्रेग्नेंसी में पहली बार मिली बढ़ी हुई शुगर। कुछ दुर्लभ प्रकार भी होते हैं। इस हिस्से के आखिर में एक आसान टेबल इन्हें साथ-साथ रखती है।

टाइप 1

टाइप 1 में पैंक्रियास बहुत कम इंसुलिन बनाता है, इसलिए रोज़ इंसुलिन लेना पड़ता है, और न इसकी वजह पता है, न इसे रोकने का तरीका [1]। पहले इसे जुवेनाइल या बचपन में शुरू होने वाली डायबिटीज कहा जाता था [1]।

घर के लिए इसका मतलब यह है कि खाना और टहलना मायने रखते हैं, लेकिन वे इंसुलिन की जगह नहीं ले सकते। टाइप 1 उस स्थिति से अलग है जिसके बारे में यह पेज ज़्यादातर बात करता है, इसलिए बाकी पेज यह ध्यान में रखकर पढ़िए।

टाइप 2

टाइप 2 में शरीर इंसुलिन का ठीक से इस्तेमाल करना बंद कर देता है, और लक्षण इतने हल्के हो सकते हैं कि बीमारी शुरू होने के सालों बाद पता चलती है [1]। डायबिटीज वाले ज़्यादातर लोगों को यही प्रकार होता है [1]।

यह ज़्यादा वज़न वाले लोगों में, और अधेड़ या बड़ी उम्र में ज़्यादा आम है, लेकिन अब कम उम्र के लोगों और कम BMI वालों में भी बढ़ता दिख रहा है [3]। भारत में यह आखिरी बात खास मायने रखती है, और अगला बड़ा हिस्सा बताता है क्यों।

बाकी पेज इसी प्रकार के बारे में है: जांच की उम्र, टेस्ट के नंबर, बचाव वाला ट्रायल और रोज़ की दिनचर्या, सब पहले टाइप 2 पर लागू होते हैं।

टाइप 2 से पहले का दौर (प्रीडायबिटीज)

प्रीडायबिटीज का मतलब है ब्लड शुगर सामान्य सीमा से ऊपर, लेकिन उस लाइन से नीचे जो डायबिटीज तय करती है [3]। बचाव इसी दौर को निशाना बनाता है, और आगे भारतीय बचाव ट्रायल वाला हिस्सा दिखाता है कि उससे कितना फ़र्क पड़ा [3]।

ज़्यादातर टाइप 2 के पीछे इंसुलिन रेज़िस्टेंस होता है: शरीर की कोशिकाएं इंसुलिन की बात पहले जैसी नहीं मानतीं, तो ग्लूकोज़ खून में रह जाता है [1] [3]।

बढ़ी हुई शुगर का यह दौर, विस्तार से: गाइड पढ़ें

इंसुलिन रेज़िस्टेंस, विस्तार से: गाइड पढ़ें

प्रेग्नेंसी में पहली बार मिली बढ़ी हुई शुगर को जेस्टेशनल डायबिटीज कहते हैं। यह लक्षणों से नहीं, प्रेग्नेंसी की नियमित जांच (एंटीनेटल स्क्रीनिंग) से पकड़ में आती है, और यह विषय इस पेज का नहीं, आपके और आपके गायनेकोलॉजिस्ट के बीच का है [1]।

दूसरे प्रकार

कुछ दुर्लभ प्रकार भी होते हैं, जैसे मोनोजेनिक, पैंक्रियास से जुड़े और दवाओं से होने वाले; ये इस गाइड के दायरे से बाहर हैं [3]।

प्रकार क्या गड़बड़ होती है आम तौर पर किसे होती है इस पेज पर कहां
टाइप 1 इंसुलिन बहुत कम बनता है डायग्नोसिस से ही इंसुलिन चाहिए सिर्फ़ इशारा
टाइप 2 इंसुलिन का ठीक इस्तेमाल नहीं होता बड़े लोग, और भारतीयों में जल्दी पेज का ज़्यादातर हिस्सा
टाइप 2 से पहले शुगर बढ़ी हुई, डायबिटीज की लाइन से नीचे भारतीय वयस्कों का बड़ा हिस्सा नीचे बचाव वाला हिस्सा
प्रेग्नेंसी में प्रेग्नेंसी में पहली बार मिली बढ़ी हुई शुगर प्रेग्नेंसी की जांच में पकड़ में आती है आपके गायनेकोलॉजिस्ट

भारतीयों को यह जल्दी क्यों होती है?

जिन चाचा को 42 की उम्र में डायग्नोसिस मिला, वे देखने में वैसे लगते भी नहीं थे। वज़न सामान्य, मीठे का कोई खास शौक नहीं, बाज़ार पैदल जाते हैं। ऐसे हर डिनर पर एक ही सवाल उठता है: "मुझे कैसे हो गया?"

सच्चा जवाब यह है कि भारतीय शरीर यह जोखिम अलग तरह से उठाता है।

डॉक्टर इसे "एशियन इंडियन फ़ीनोटाइप" कहते हैं: एक ही BMI पर भारतीयों के शरीर में आम तौर पर कुल चर्बी ज़्यादा होती है, उसका ज़्यादा हिस्सा पेट के अंदर अंगों के आसपास (विसरल फ़ैट) जमा होता है, और व्हाइट कॉकेशियन लोगों के मुकाबले इंसुलिन रेज़िस्टेंस भी ज़्यादा होता है [3]।

ICMR की अपनी गाइडलाइन इसका नतीजा साफ़ लिखती है: भारतीयों में टाइप 2 दूसरे बड़े नस्लीय समूहों के मुकाबले कम से कम दस साल पहले होती है [3]।

तो आम तस्वीर, यानी अधेड़ उम्र का भारी शरीर वाला इंसान, कई ऐसे भारतीयों को छोड़ देती है जिन पर जोखिम है। तराज़ू का वज़न बस एक हिस्सा है; वज़न कहां जमा है, और परिवार में और किसे है, यह भी उतना ही मायने रखता है।

इसीलिए भारतीय जांच-सूची जल्दी शुरू होती है और सिर्फ़ वज़न से आगे देखती है। इसमें ये जोखिम गिने गए हैं [3]:

  • परिवार: परिवार में डायबिटीज [3]।
  • शरीर: BMI 23 या उससे ज़्यादा, या कमर पुरुषों में 90 cm और महिलाओं में 80 cm से ज़्यादा [3]।
  • खून: ब्लड प्रेशर 130/80 या उससे ज़्यादा, या उसकी दवा चल रही हो, या कोलेस्ट्रॉल असामान्य हो [3]।
  • आदतें: शारीरिक एक्टिविटी कम होना [3]।
  • इतिहास: पिछली प्रेग्नेंसी में बढ़ी हुई शुगर या 3.5 kg से ज़्यादा वज़न का बच्चा, दिल की बीमारी या स्ट्रोक, पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (देखिए हमारी PCOS और PCOD गाइड), या गर्दन की सिलवटों पर गहरी, मखमली त्वचा, जिसे एकैंथोसिस निग्रिकैंस कहते हैं [3]।

असल में इसका मतलब है कि सामान्य दिखने वाला 35 साल का कोई व्यक्ति, जिसके पिता को डायबिटीज है और जिसकी कमर 90 cm से आगे निकल गई है, सीधे इस सूची में आता है। जांच ब्लड टेस्ट से होती है, आईने में देखकर अंदाज़े से नहीं।

कुल मिलाकर: जितना आप सोचते हैं, उससे पहले जांच करवाइए, और कमर व परिवार के इतिहास को वज़न जितनी ही गंभीरता से लीजिए।

जांच कैसे होती है? रिपोर्ट के नंबर और शुगर लेवल कितना होना चाहिए

रिपोर्ट आती है तो आपके नाम के आगे तीन-चार लाइनें होती हैं: फ़ास्टिंग, ग्लूकोज़ पीने के दो घंटे बाद, HbA1c, और उनमें से किसी एक के आगे एक स्टार।

इन नंबरों का मतलब क्या है, और फ़ैसला कौन सा नंबर करता है?

भारतीय मापदंडों में डायबिटीज की लाइन यह है: खाली पेट प्लाज़्मा ग्लूकोज़ 126 mg/dl या उससे ज़्यादा, 75 g ग्लूकोज़ पीने के दो घंटे बाद 200 mg/dl या उससे ज़्यादा, HbA1c 6.5% या उससे ज़्यादा, या लक्षणों के साथ रैंडम शुगर 200 या उससे ज़्यादा [3]।

डायग्नोसिस पक्का करने से पहले एक असामान्य नतीजे की पुष्टि दूसरे टेस्ट से की जाती है [3]।

इस लाइन से नीचे लेकिन सामान्य से ऊपर बढ़ी हुई शुगर का दौर है। इसके बैंड हैं: खाली पेट 100 से 125 mg/dl (भारतीय टेबल WHO का 110 से 125 वाला बैंड भी दिखाती है), दो घंटे बाद 140 से 199, या HbA1c 5.7 से 6.4% [3]।

HbA1c का मतलब क्या है? यही वह नंबर है जिसे डॉक्टर महीनों तक देखते हैं: यह पिछले लगभग तीन महीनों की आपकी औसत ब्लड शुगर दिखाता है, न कि सिर्फ़ उस सुबह की जिस दिन आपने खून दिया [8]।

जांच किसे करवानी चाहिए? 30 साल से ऊपर हर किसी को, और ऊपर की सूची का कोई भी जोखिम हो तो उससे पहले [3]। आधे से ज़्यादा मरीज़ों में कोई लक्षण होता ही नहीं, इसलिए जांच लक्षण का इंतज़ार नहीं कर सकती [3]।

अगर आपकी रिपोर्ट में बीच वाले बैंड का नंबर है, तो अगला कदम आपके डॉक्टर हैं, यह पेज नहीं। दोबारा टेस्ट, उसका समय और क्या बदलना है, यह वे आपके साथ तय करेंगे।

खाली पेट शुगर कितनी होनी चाहिए, और बाकी टेस्ट में कौन सा नंबर किस बैंड में आता है, यह नीचे की टेबल एक साथ दिखाती है।

टेस्ट नॉर्मल बढ़ी हुई, लाइन से नीचे डायबिटीज
खाली पेट (फ़ास्टिंग) प्लाज़्मा ग्लूकोज़ 100 mg/dl से कम 100 से 125 mg/dl 126 mg/dl या ज़्यादा
75 g ग्लूकोज़ के दो घंटे बाद 140 mg/dl से कम 140 से 199 mg/dl 200 mg/dl या ज़्यादा
HbA1c 5.7% से कम 5.7 से 6.4% 6.5% या ज़्यादा

भारतीय मापदंड; फ़ास्टिंग के बैंड उस पैमाने पर हैं जो भारतीय टेबल WHO के पैमाने के साथ दिखाती है; एक असामान्य नतीजे की पुष्टि दूसरे टेस्ट से होती है।

डायबिटीज से बचाव कैसे करें: एक भारतीय ट्रायल ने क्या पाया

"पापा को है। मुझे भी होगा क्या?" अगर आपने यह पूछा है, तो आप सही समय पर सही सवाल पूछ रहे हैं, क्योंकि टाइप 2 के लिए जवाब है: ज़रूरी नहीं।

तो क्या खाना और एक्टिविटी बदलने से यह सच में रुकती है, या बस रिपोर्ट एक साल आगे खिसक जाती है?

एक भारतीय ट्रायल में 531 ऐसे वयस्कों को, जिनका ग्लूकोज़ टॉलरेंस बिगड़ा हुआ था (ग्लूकोज़ पीने के दो घंटे बाद बढ़ी हुई रीडिंग), औसतन 30 महीने (मीडियन) तक फ़ॉलो किया गया [4]। ये लोग दूसरी जगहों के पहले हुए बचाव ट्रायलों के लोगों से कम उम्र के और दुबले थे: औसत उम्र लगभग 46 और औसत BMI 25.8 [4]।

तीन साल में, जिस ग्रुप को कोई खास सलाह नहीं मिली उसमें 55.0% लोगों में नए केस आए, और जिस ग्रुप को लाइफ़स्टाइल बदलने की सलाह मिली उसमें 39.3% में [4]। यह 28.5% की सापेक्ष कमी है, यानी एक केस टालने के लिए लगभग छह-सात लोगों को यह सलाह देनी पड़ी [4]।

अमेरिका के बड़े ट्रायल ने भारी शरीर वाले लोगों में यही कहानी दोहराई। 3,234 वयस्कों में, जिनकी फ़ास्टिंग और ग्लूकोज़ के बाद की शुगर बढ़ी हुई थी और औसत BMI 34 था, 7% वज़न कम करने और हफ़्ते में 150 मिनट एक्टिविटी वाले प्रोग्राम ने औसतन 2.8 साल में, प्लेसिबो के मुकाबले, नए केस 58% कम किए [9]।

भारतीय स्टडी समेत सारी स्टडी साथ रखें, तो प्रीडायबिटीज वाले एक-तिहाई तक लोगों में डायबिटीज रोकी जा सकती है [3]।

सलाह में आखिर था क्या? कुछ भी अनोखा नहीं: अमेरिकी प्रोग्राम दो लक्ष्यों पर चला, हफ़्ते की एक्टिविटी का एक लक्ष्य और थोड़ा वज़न कम करना [9]।

भारतीय घर में इसका मतलब है रात के खाने के बाद 30 मिनट की तेज़ सैर, चावल की छोटी कटोरी के साथ दाल की बड़ी कटोरी, और मिठाई रोज़ शाम नहीं, खास मौकों के लिए।

कुल मिलाकर: टाइप 2 में बचाव का मतलब जोखिम कम होना है, कोई वादा नहीं; सबूत सैर और कटोरी की तरफ़ इशारा करते हैं।

रोज़ डायबिटीज कैसे कंट्रोल करें

रोज़ का कंट्रोल पांच चीज़ों पर टिका है: थाली में क्या है, आप कितना चलते-फिरते हैं, नींद, वज़न, और डॉक्टर की लिखी दवाएं, साथ में नियमित जांच ताकि पता रहे कि यह काम कर रहा है [1] [8]। इनमें से कुछ भी नाटकीय नहीं है, और सब रोज़ का है।

शुरुआत थाली से कीजिए। भारतीय गाइडेंस कहती है कि खाना परिवार के खाने जैसा ही हो, और ज़्यादा फ़ाइबर वाले कार्बोहाइड्रेट पर टिका हो, जैसे साबुत अनाज, मिलेट्स और दालें [3]।

अनाज-दाल की जोड़ियां जैसे इडली, डोसा, खिचड़ी और मिस्सी रोटी, खाने में डाला नमक दिन में 5 g से कम, और फलों का जूस न ही लें तो बेहतर [3]।

कार्बोहाइड्रेट पर दोनों भारतीय संस्थाएं एक नंबर नहीं, एक रेंज देती हैं: 2018 की राष्ट्रीय गाइडलाइन में कुल ऊर्जा का 55 से 60%, और 2020 की सोसाइटी सिफ़ारिशों में 50 से 60%, जो कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाले विकल्प भी बेहतर मानती हैं [3] [10]।

डायबिटीज में क्या खाएं, हमारी गाइड। यह आम भारतीय थाली लेकर सब्ज़ी, दाल और रोटी के हिस्से नए सिरे से बांटती है। फिर रोटी, चावल और मिलेट्स उनके मापे गए GI के साथ, प्रोटीन वाला चौथाई हिस्सा, सब्ज़ियां और फल, तेल, घी और तली चीज़ें, दिन में कितनी बार खाएं, और क्या सीमित करें।

यह फ़्रिज पर चिपकाने वाले चार्ट के लिए नहीं, खाना बनाने वाले के लिए लिखी गई है। इस पेज के बाद एक ही गाइड पढ़नी हो, तो यही पढ़िए: डायबिटीज में क्या खाएं।

कौन सा आटा खरीदें। आम आटे आपस में कैसे तुलना करते हैं, यह गाइड गेहूं के आटे को मैदे के सामने रखती है, फिर मिलेट्स, बेसन और जौ को फ़ाइबर और भारतीय स्टडी में मापे गए GI पर साथ रखती है।

यह बताती है कि कोई एक सबसे अच्छा आटा क्यों नहीं है, और राष्ट्रीय डाइट गाइडलाइन क्या सलाह देती हैं।

यह यह भी दिखाती है कि कोई भी रोटी शुगर कम कैसे बढ़ाए, और आखिर में इन आटों से बेकिंग और मिठाइयां हैं, ताकि लड्डू छोड़ना न पड़े। अगली बार चक्की जाने से पहले इसे पढ़िए।

इसके बाद एक्टिविटी: हफ़्ते में लगभग 150 मिनट मध्यम एक्टिविटी, और तेज़ चलना भी इसमें गिना जाता है; एक्टिव रहने से नींद भी अक्सर बेहतर होती है [8]। खाने और एक्टिविटी के साथ दूसरा सहारा है सेहतमंद वज़न और उसे बनाए रखना, और ज़्यादातर बड़ों के लिए रात में लगभग 7 से 8 घंटे की नींद [8]।

गोलियां और इंसुलिन डॉक्टर का हिस्सा हैं। यह पेज नहीं बताता कि किसे कौन सी दवा ठीक है, और यहां लिखी कोई भी बात दवा शुरू करने, बंद करने या बदलने की वजह नहीं है; यह बात उसी से कीजिए जिसके पास आपकी रिपोर्ट है।

जांच का ढांचा सीधा है: औसत ग्लूकोज़ के लिए HbA1c, ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल, और अगर आप सिगरेट पीते हैं तो उसे छोड़ना [8]। इसमें अगले हिस्से की आंख, किडनी और पैरों की जांच जोड़ दीजिए, और साल भर का कैलेंडर तैयार है।

घर का सबसे आसान पोर्शन टूल स्टील की छोटी कटोरी है। थाली में डालने से पहले चावल उसमें नापिए, और दाल-सब्ज़ी की कटोरियां उससे ज़्यादा रखिए।

सालों तक ज़्यादा शुगर क्या करती है, और हर साल की जांच

सालों तक ज़्यादा रहने वाला ग्लूकोज़ दिल, आंखों, किडनी और नसों की खून की नलियों को नुकसान पहुंचाता है, और हार्ट अटैक, स्ट्रोक और किडनी फ़ेल होने का जोखिम बढ़ाता है [1]।

नसों को नुकसान और पैरों में खून का कम बहाव पैरों में घाव (फ़ुट अल्सर) कर सकता है, और इससे अंग काटने की नौबत भी आ सकती है [1]।

डॉक्टर इन्हीं कॉम्प्लिकेशंस पर नज़र रखते हैं, और शुगर दायरे में रहे और नियमित जांच हो, तो इन्हें टाला या देर से लाया जा सकता है [1]। इस हिस्से का असली मकसद नीचे वाला कैलेंडर है।

डायग्नोसिस के समय और उसके बाद कम से कम साल में एक बार, तीन जांच होनी चाहिए: आंख के डॉक्टर (ऑप्थैल्मोलॉजिस्ट) से पुतली फैलाकर आंखों की जांच, यूरिन एल्ब्यूमिन-क्रिएटिनिन रेशियो और सीरम क्रिएटिनिन से किडनी की जांच, और नसों व खून के बहाव की दिक्कतों के लिए पैरों की पूरी जांच [3]।

ये तीनों डायरी के उसी पन्ने पर लिखिए जिस पर HbA1c लिखा है।

कुल मिलाकर: नुकसान धीरे होता है और जांच हर साल; दूसरी चीज़ ही पहली को रोकती है।

मिठास की जगह कहां है: चाय, मिठाई, गुड़ और स्वीटनर

दिन में दो कप चाय, हर कप में दो चम्मच चीनी। एक भी बिस्किट गिनने से पहले ही यह चार चम्मच हो गई। फिर डायग्नोसिस आता है, और पूरा परिवार सबसे पहले मिठास ही छीनने की कोशिश करता है।

क्या मीठा छोड़ना पड़ेगा, या सिर्फ़ चीनी?

शुरुआत उस बदलाव से, जो ज़्यादातर घर सबसे पहले करते हैं: चीनी बाहर, गुड़ या शहद अंदर। अंतरराष्ट्रीय GI टेबल में टेबल शुगर 65 पर है और शहद 61 पर, दोनों मीडियम बैंड में, तो कप में चाहे जो घोलें, असर लगभग एक जैसा रहता है [11]।

गुड़ उन टेबल में नहीं है, लेकिन भारतीय फ़ूड कंपोज़िशन टेबल में 100 g गुड़ में लगभग 84 g शुगर है, यानी यह कुछ मिनरल्स वाली शुगर है, कोई अलग चीज़ नहीं [5]।

चार सफ़ेद कटोरियों में गुड़, शहद, सफ़ेद चीनी और खजूर

टाइप 2 के लिए भारतीय गाइडेंस में शहद उसी "बेहतर है न लें" वाली सूची में है, जिसमें फ़्रुक्टोज़, कॉर्न सिरप और शीरा (मोलैसेस) हैं [3]।

कितनी चीनी ठीक है? ICMR-NIN की 2024 की डाइट गाइडलाइन बड़ों के लिए चीनी को दिन की कुल ऊर्जा के 5% से कम रखने को कहती है [12]।

WHO के हिसाब से लगभग 2,000 कैलोरी लेने वाले वयस्क के लिए 10% मतलब लगभग 12 लेवल चम्मच, तो 5% लगभग छह चम्मच हुए, और दो चम्मच वाली दो कप चाय उनमें से चार पहले ही ले चुकी है [13]।

अब बात स्वीटनर की, और गाइडलाइन उनके बारे में असल में क्या कहती हैं:

  • भारतीय सोसाइटी की सिफ़ारिशें (2020): आर्टिफ़िशियल स्वीटनर सुझाई गई मात्रा में लिए जा सकते हैं, और चीनी वाली ड्रिंक्स से बचना बेहतर है [10]।
  • अमेरिकन डायबिटीज एसोसिएशन (2026): कैलोरी और कार्बोहाइड्रेट घटाने के लिए नॉन-न्यूट्रिटिव स्वीटनर संयम से और थोड़े समय के लिए चीनी वाली चीज़ों की जगह ले सकते हैं [6]।
  • WHO (2023): इसकी गाइडलाइन वज़न कंट्रोल के लिए स्वीटनर इस्तेमाल न करने की सलाह देती है, और यह उन लोगों पर लागू नहीं होती जिन्हें पहले से डायबिटीज है [14]।

तो स्वीटनर की इजाज़त है, संयम से, ताकि कप मीठा रहे और चीनी डिब्बे में ही रहे। सवाल यह है कि कौन सा, और हर एक की अपनी एक कमी है।

  • स्टेविया: स्टेविया की पत्ती से बने स्टीवियोल ग्लाइकोसाइड्स, चीनी से 200 से 400 गुना मीठे; हाई-प्योरिटी वालों के GRAS नोटिस पर अमेरिकी FDA ने सवाल नहीं उठाया है [15]। कुछ लोगों को कड़वा आफ़्टरटेस्ट लगता है, जिसकी वजह जीभ के वे दो कड़वाहट वाले रिसेप्टर हैं जो स्टीवियोल ग्लाइकोसाइड्स पर प्रतिक्रिया करते हैं [16]।
  • एरिथ्रिटॉल वाले ब्लेंड: चम्मच-दर-चम्मच चीनी जितना नपने वाले पाउडर को भराव चाहिए, क्योंकि एक चुटकी एक्सट्रैक्ट से चम्मच नहीं भरता, और वह भराव अक्सर एरिथ्रिटॉल होता है, एक शुगर अल्कोहल। 13 अक्टूबर 2026 को हमने भारत में ऑनलाइन बिकने वाले 55 मोंक फ्रूट स्वीटनर जांचे, तो आधे से ज़्यादा पाउडर (40 में से 23) में एरिथ्रिटॉल था [17]।
  • सुक्रालोज़ और दूसरे आर्टिफ़िशियल स्वीटनर: सुक्रालोज़ चीनी से लगभग 600 गुना मीठा है और गर्मी में टिका रहता है, जो खाना बनाने में काम आता है; यह एक आर्टिफ़िशियल स्वीटनर है [15]।
  • मोंक फ्रूट (Siraitia grosvenorii, लुओ हान गुओ): एक्सट्रैक्ट चीनी से 100-250 गुना मीठा; जनरल-पर्पज़ और टेबलटॉप स्वीटनर के रूप में इसके GRAS नोटिस पर अमेरिकी FDA ने सवाल नहीं उठाया [15]। 2017 के ट्रायल (30 सेहतमंद पुरुष) में मोंक फ्रूट वाली ड्रिंक से पहले घंटे में ग्लूकोज़ या इंसुलिन में कोई स्पाइक नहीं आया, चीनी वाली ड्रिंक के उलट [18]।

एरिथ्रिटॉल पर एक बात और। 2023 में एरिथ्रिटॉल के दिल और खून की नलियों पर संभावित असर वाले एक वैज्ञानिक पेपर के बाद बहुत से लोग लेबल पढ़ने लगे; अमेरिकी FDA ने उसकी समीक्षा की और कहा कि उसमें बताई गई ऑब्ज़र्वेशनल स्टडी कारण का रिश्ता साबित नहीं करतीं [15]।

एक कड़ी, सबूत नहीं, और फिर भी पैक का पिछला हिस्सा पढ़ने की एक ठीक वजह।

मोंक फ्रूट की ईमानदार सीमा यह है कि इस पर पुराने स्वीटनर्स जितना लंबा रिसर्च रिकॉर्ड नहीं है: 2017 का वह ट्रायल छोटा और कम समय का था, और डायबिटीज वाले लोगों पर नहीं हुआ था [18]। मोंक फ्रूट पर रिसर्च क्या कहती है, यह गाइड इसे विस्तार से बताती है।

The Sweet Change में, हमारा पाउडर मोंक फ्रूट, ग्वार फ़ाइबर और एल्यूलोज़ (30% / 35% / 35%) से बना है, बिना एरिथ्रिटॉल के, और हमारे ड्रॉप्स में एरिथ्रिटॉल या कोई दूसरा शुगर अल्कोहल नहीं है। हमने यह फ़ैसला 2023 की उस स्टडी को ध्यान में रखकर लिया, जिसमें एक कड़ी मिली थी, सबूत नहीं।

रोज़ की चाय के लिए हमारी पसंद एक मोंक फ्रूट स्वीटनर है जो शुगर अल्कोहल के बिना बना हो। कसौटी हमारी अपनी है: स्वाद, छोटी इंग्रीडिएंट लिस्ट और शुगर अल्कोहल नहीं।

हमारे अपने खरीदारों के सर्वे में 31% ने कहा कि उन्होंने हमें इसलिए चुना क्योंकि कड़वा आफ़्टरटेस्ट नहीं है, और 64% ने कहा कि उनका स्वीटनर चाय में जाता है [7]।

हर विकल्प एक जगह। डायबिटीज वाले लोगों के लिए स्वीटनर पर हमारी गाइड पहले बताती है कि स्वीटनर को कैसे परखें। फिर स्टेविया और मोंक फ्रूट, आर्टिफ़िशियल स्वीटनर, शुगर अल्कोहल और एरिथ्रिटॉल का सवाल, और वे "हेल्दी" विकल्प जो असल में शुगर ही हैं, एक-एक करके लेती है।

इसमें यह भी है कि WHO को स्वीटनर और जोखिम पर क्या मिला, चाय, कॉफ़ी, खीर और बेकिंग के लिए कौन सा फ़ॉर्मेट ठीक है, और आखिर में पूरा पेज एक टेबल में। इसे तब पढ़िए जब आप दुकान में हाथ में दो पैक लिए खड़े हों।

हमने कैसे तुलना की: भरोसा यानी रोज़ की चाय के लिए हम अपनी पसंद पर कितने पक्के हैं, स्वाद, इंग्रीडिएंट लिस्ट और गाइडलाइन के आधार पर; यह हमारी राय है, रिसर्च की ग्रेडिंग नहीं।

विकल्प यह क्या है ईमानदार कमी रोज़ की चाय के लिए हमारा भरोसा
शुगर अल्कोहल के बिना मोंक फ्रूट फल का एक्सट्रैक्ट, चीनी से 100 से 250 गुना मीठा पुराने स्वीटनर्स के मुकाबले लंबे समय की ह्यूमन स्टडी कम ज़्यादा भरोसा
स्टेविया स्टेविया की पत्ती से स्टीवियोल ग्लाइकोसाइड्स कुछ लोगों को कड़वा आफ़्टरटेस्ट मध्यम भरोसा
एरिथ्रिटॉल वाले ब्लेंड ज़्यादातर शुगर अल्कोहल, थोड़ा एक्सट्रैक्ट 2023 की स्टडी में एक कड़ी मिली, सबूत नहीं कम भरोसा
सुक्रालोज़ और दूसरे आर्टिफ़िशियल स्वीटनर सिंथेटिक, सुक्रालोज़ लगभग 600 गुना मीठा आर्टिफ़िशियल कम भरोसा
गुड़, शहद, चीनी शुगर शुगर ही गिने जाते हैं कोई लेबल नहीं: शुगर ही गिनें

शुरुआत उस कप से कीजिए जो आप सबसे ज़्यादा पीते हैं। हम में से ज़्यादातर के लिए वह सुबह की चाय है, और आदत बदले बिना चम्मच बदलने की सबसे आसान जगह वही है।

हमारी गाइड, इस क्रम में पढ़िए

यह पेज नक्शा है। नीचे की गाइड एक-एक सवाल लेकर गहराई में जाती हैं, और हम इन्हें इसी क्रम में पढ़ेंगे।

  • भारतीय तरीके से क्या खाएं: नए सिरे से बंटी थाली, रोटी और चावल की मात्रा, प्रोटीन वाला चौथाई हिस्सा, एक सैंपल दिन और क्या सीमित करें।
  • आटे की तुलना: मैदे के सामने आटा, फ़ाइबर और GI पर मिलेट्स और बेसन, और कोई भी रोटी शुगर पर हल्की कैसे बनाएं। अगली बार चक्की जाने से पहले वाली गाइड।
  • डायबिटीज वाले लोगों के लिए स्वीटनर: एक ही कसौटी पर परखा गया हर विकल्प, फ़ॉर्मेट, और वे बदलाव जो अब भी शुगर ही हैं। दुकान में पैक चुनते समय वाली गाइड।
  • मोंक फ्रूट, रिसर्च: मिठास कहां से आती है, एक कप के बाद ग्लूकोज़ और इंसुलिन, लेबल पर देखने लायक फ़िलर, और इसकी ईमानदार कमियां।
  • स्टेविया, स्टडी: स्टेविया क्या है, टाइप 2 वाले लोगों पर हुए ट्रायल, स्टेविया के पैक में और क्या होता है, और चाय व बेकिंग में इसे कैसे इस्तेमाल करें।

  • टाइप 2 से पहले का बढ़ी हुई शुगर वाला दौर: गाइड पढ़ें

  • इंसुलिन रेज़िस्टेंस: गाइड पढ़ें

आपकी रसोई के लिए छोटा सार

चीट शीट

  • लाइन पहचानिए: फ़ास्टिंग 126 mg/dl या ज़्यादा, या HbA1c 6.5% या ज़्यादा, दूसरे टेस्ट से पुष्टि के साथ; बीच वाले बैंड का नंबर वापस डॉक्टर के पास जाता है।
  • 30 पर जांच करवाइए: परिवार में डायबिटीज हो, कमर 90 cm (पुरुष) या 80 cm (महिला) से ज़्यादा हो, या BMI 23 या ज़्यादा हो, तो उससे पहले।
  • सैर कीजिए, और चावल की कटोरी छोटी कीजिए: एक भारतीय ट्रायल में, बढ़ी हुई शुगर वाले लोगों में सिर्फ़ लाइफ़स्टाइल की सलाह से नए केस 28.5% कम हुए।
  • मिठास रखिए, चीनी बदलिए: गुड़ और शहद भी शुगर हैं; चीनी दिन की ऊर्जा के 5% से कम रहे; संयम से और थोड़े समय के लिए एक स्वीटनर उसकी जगह ले सकता है।
  • साल के चार नंबर और तीन जांच: HbA1c, ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल और सिगरेट से दूरी, साथ में आंख, किडनी और पैरों की सालाना जांच।

भारतीय घर के लिए डायबिटीज, डायग्नोसिस से ज़्यादा कुछ आदतों का नाम है: एक रीडिंग जो आपको याद है, एक सैर जो आप नहीं छोड़ते, एक थाली जिसके हिस्से आपने नए सिरे से बांटे हैं, और चाय का एक कप जो मीठा ही रहा।

उस आखिरी आदत के इंग्रीडिएंट वाले पहलू के लिए, हमारी स्वीटनर गाइड हर उस स्वीटनर को समझाती है जिसके बारे में हम लिखते हैं।

मोंक फ्रूट ड्रॉप्स और पाउडर, सैशे जल्द आ रहे हैं। Monk Fruit Drops: दो ड्रॉप एक टीस्पून चीनी की जगह लेती हैं। Monk Fruit Sweetener Powder: मोंक फ्रूट, ग्वार फ़ाइबर और एल्यूलोज़ (30% / 35% / 35%) से बना, बिना एरिथ्रिटॉल के। दोनों में एरिथ्रिटॉल या कोई दूसरा शुगर अल्कोहल नहीं है। जनरल-पर्पज़ और टेबलटॉप स्वीटनर के तौर पर मोंक फ्रूट एक्सट्रैक्ट के GRAS नोटिस पर अमेरिकी FDA ने सवाल नहीं उठाया है। स्वीटनर देखिए

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लोग अक्सर पूछते हैं

डायबिटीज क्या है?

WHO की परिभाषा में यह लंबी चलने वाली स्थिति है, जिसमें खून का ग्लूकोज़ ज़्यादा रहता है, क्योंकि पैंक्रियास कम इंसुलिन बनाता है या शरीर उसे ठीक से इस्तेमाल नहीं कर पाता। इंसुलिन ग्लूकोज़ को खून से कोशिकाओं तक ले जाता है। ब्लड टेस्ट इसे पकड़ता है, और खाने, एक्टिविटी, वज़न और दवाओं से इसे उम्र भर संभाला जाता है।

डायबिटीज क्यों और कैसे होती है?

जब इंसुलिन कम पड़ जाए या ठीक से काम न करे। WHO की फ़ैक्ट शीट के मुताबिक टाइप 1 में पैंक्रियास बहुत कम इंसुलिन बनाता है और इसकी वजह पता नहीं है। आम प्रकार टाइप 2 में शरीर इंसुलिन का ठीक इस्तेमाल नहीं करता, और उसी फ़ैक्ट शीट के अनुसार ज़्यादा वज़न, कम एक्सरसाइज़ और फ़ैमिली हिस्ट्री जोखिम बढ़ाते हैं।

भारतीयों में डायबिटीज जल्दी क्यों शुरू होती है?

एक ही BMI पर भारतीयों में व्हाइट कॉकेशियन लोगों से ज़्यादा कुल चर्बी, पेट की चर्बी और इंसुलिन रेज़िस्टेंस होता है; ICMR की टाइप 2 गाइडलाइन इसे एशियन इंडियन फ़ीनोटाइप कहती है। यही गाइडलाइन बताती है कि भारतीयों में टाइप 2 कम से कम दस साल पहले शुरू होती है, इसलिए यहां जांच तीस से शुरू होती है।

डायबिटीज में गुड़, शहद या चीनी, कौन सा ठीक है?

कोई भी नहीं, क्योंकि तीनों शुगर ही हैं। अंतरराष्ट्रीय GI टेबल में शहद और टेबल शुगर मीडियम बैंड में पास-पास हैं, और भारतीय फ़ूड टेबल में गुड़ वज़न के हिसाब से ज़्यादातर शुगर है। ICMR की टाइप 2 गाइडलाइन शहद को उन मीठी चीज़ों में रखती है जिनसे बचना बेहतर है, इसलिए सही सवाल "कौन सा" नहीं, "कितना" है।

डायबिटीज में चाय के लिए कौन सा स्वीटनर सबसे अच्छा है?

हमारी पसंद शुगर अल्कोहल के बिना बना मोंक फ्रूट स्वीटनर है, स्वाद, छोटी इंग्रीडिएंट लिस्ट और एरिथ्रिटॉल न होने के आधार पर; यह हमारी राय है, मेडिकल फ़ैसला नहीं। अमेरिकन डायबिटीज एसोसिएशन के स्टैंडर्ड कहते हैं कि नॉन-न्यूट्रिटिव स्वीटनर संयम से, थोड़े समय के लिए चीनी की जगह ले सकते हैं, और हम हर स्वीटनर ऐसे ही सुझाते हैं।

किस उम्र में शुगर की जांच करवानी चाहिए?

ICMR की टाइप 2 गाइडलाइन के मुताबिक तीस से हर किसी को, और जोखिम हो तो पहले, जैसे परिवार में डायबिटीज, भारतीय कट-ऑफ़ से ज़्यादा BMI या कमर, पिछली प्रेग्नेंसी में बढ़ी शुगर या पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम। आधे से ज़्यादा मरीज़ों में कोई लक्षण नहीं होता, इसलिए लक्षण का इंतज़ार मत कीजिए।

Monk Fruit Drops (100 सर्विंग)Monk Fruit Drops (100 सर्विंग) Rs. 497.00 Monk Fruit Drops (300 सर्विंग)Monk Fruit Drops (300 सर्विंग) Rs. 1,197.00 Monk Fruit Powder No Erythritol (100 सर्विंग)Monk Fruit Powder No Erythritol (100 सर्विंग) Rs. 675.00 Monk Fruit Powder No Erythritol (300 सर्विंग)Monk Fruit Powder No Erythritol (300 सर्विंग) Rs. 1,493.00

स्रोत

  1. World Health Organization (2024). Diabetes, fact sheet, 14 November 2024. WHO, Geneva. https://www.who.int/news-room/fact-sheets/detail/diabetes
  2. Anjana RM, Unnikrishnan R, Deepa M, et al.; ICMR-INDIAB Collaborative Study Group (2023). Metabolic non-communicable disease health report of India: the ICMR-INDIAB national cross-sectional study (ICMR-INDIAB-17). The Lancet Diabetes & Endocrinology, 11(7), 474-489. DOI https://doi.org/10.1016/S2213-8587(23)00119-5
  3. Indian Council of Medical Research (2018). ICMR Guidelines for Management of Type 2 Diabetes 2018, sections 1 (the Asian Indian phenotype and prevention), 2 (screening), 3 (diagnostic criteria), 6.2 (medical nutrition therapy) and the summary recommendations on annual checks. ICMR, New Delhi. https://www.icmr.gov.in/icmrobject/custom_data/pdf/resource-guidelines/ICMR_GuidelinesType2diabetes2018_0.pdf
  4. Ramachandran A, Snehalatha C, Mary S, Mukesh B, Bhaskar AD, Vijay V; Indian Diabetes Prevention Programme (2006). The Indian Diabetes Prevention Programme shows that lifestyle modification and metformin prevent type 2 diabetes in Asian Indian subjects with impaired glucose tolerance (IDPP-1). Diabetologia, 49(2), 289-297. DOI https://doi.org/10.1007/s00125-005-0097-z
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  6. American Diabetes Association Professional Practice Committee (2026). 5. Facilitating Positive Health Behaviors and Well-being to Improve Health Outcomes: Standards of Care in Diabetes, 2026. Diabetes Care, 49(Suppl 1), S89-S131. DOI https://doi.org/10.2337/dc26-s005 and full text https://pmc.ncbi.nlm.nih.gov/articles/PMC12690188/
  7. The Sweet Change (2026). Post-purchase survey of our own buyers. Internal data; percentages are whole-number shares of the buyers who answered each question. https://www.thesweetchange.com/
  8. US National Institute of Diabetes and Digestive and Kidney Diseases (2023). Managing Diabetes, last reviewed October 2023; read 15 October 2026. NIDDK, Bethesda. https://www.niddk.nih.gov/health-information/diabetes/overview/managing-diabetes
  9. Knowler WC, Barrett-Connor E, Fowler SE, et al.; Diabetes Prevention Program Research Group (2002). Reduction in the incidence of type 2 diabetes with lifestyle intervention or metformin. The New England Journal of Medicine, 346(6), 393-403. DOI https://doi.org/10.1056/NEJMoa012512
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  15. US Food and Drug Administration (2025). Aspartame and Other Sweeteners in Food. FDA, content current as of 27 February 2025. https://www.fda.gov/food/food-additives-petitions/aspartame-and-other-sweeteners-food
  16. Hellfritsch C, Brockhoff A, Stähler F, Meyerhof W, Hofmann T (2012). Human psychometric and taste receptor responses to steviol glycosides. Journal of Agricultural and Food Chemistry, 60(27), 6782-6793. DOI https://doi.org/10.1021/jf301297n
  17. The Sweet Change (2026). Market label scan of monk fruit sweeteners sold online in India: 55 marketplace listings (40 powders, 10 drops, 5 sachets), checked 13 October 2026 (internal record; aggregate counts only, brand names not published).
  18. Tey SL, Salleh NB, Henry J, Forde CG (2017). Effects of aspartame-, monk fruit-, stevia- and sucrose-sweetened beverages on postprandial glucose, insulin and energy intake. International Journal of Obesity, 41(3), 450-457. DOI https://doi.org/10.1038/ijo.2016.225

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