आईबीएस (IBS) क्या होता है: मतलब, प्रकार और घर पर क्या मदद करता है

Onion, garlic, rajma, chana, atta, milk, apple, mango, watermelon and honey on a pale counter with a kadai

IBS (इरिटेबल बाउल सिंड्रोम) में बार-बार पेट दर्द के साथ दस्त, कब्ज या दोनों होते हैं, पर आंत में कोई नुकसान नहीं दिखता [1]। यह आंत और दिमाग के तालमेल से जुड़ी लंबी समस्या है [1]। भारत के सामुदायिक अध्ययनों में यह 0.4% से 4.2% बड़ों में मिला; खाना, फ़ाइबर, नींद और तनाव सुधारने से आराम मिल सकता है [2] [1]।

मुख्य बातें

  • आंत और दिमाग का तालमेल, आंत का नुकसान नहीं: IBS में आंत और दिमाग का आपसी तालमेल गड़बड़ाता है; यह कोई ऐसी बीमारी नहीं जो आंत को नुकसान पहुँचाए [1]।
  • भारत में आम, पुरुषों में भी: सामुदायिक अध्ययनों में यह 0.4% से 4.2% बड़ों में मिला, हरियाणा के एक गाँव के अध्ययन में 4% में, और पुरुषों में लगभग उतना ही जितना महिलाओं में [2] [3]।
  • FODMAP वाला खाना इसे भड़का सकता है: प्याज़, लहसुन, बीन्स, गेहूँ, दूध और "-ol" वाले स्वीटनर FODMAP खानों की उस लिस्ट में हैं जो लक्षण बढ़ा सकते हैं [1] [2]।
  • पैक का लेबल बता देता है: भारत में जिस खाने में 10% या ज़्यादा पॉलीऑल हों, उस पर "Polyols may have laxative effect" लिखना ज़रूरी है [4]।
  • खतरे के संकेत पर डॉक्टर: मल में खून, बिना कोशिश के वज़न घटना, रात में लक्षण, या 45 की उम्र के बाद शुरुआत हो, तो जाँच करवाइए [2]।

डाइट बदलने से पहले अपने डॉक्टर या डाइटिशियन से बात करें, खासकर अगर आप डायबिटीज की दवा लेते हैं।

इस पेज पर
  1. IBS क्या होता है? आसान शब्दों में मतलब
  2. भारत में IBS कितना आम है
  3. IBS के तीन प्रकार
  4. आईबीएस के लक्षण: रोज़ कैसा महसूस होता है
  5. IBS किन वजहों से बढ़ता है: इन्फ़ेक्शन, खाना और तनाव
  6. डॉक्टर IBS कैसे पहचानते हैं, और कब दिखाएँ
  7. FODMAP: भारतीय रसोई में वो खाना जो IBS को भड़का सकता है
  8. फ़ाइबर: धीरे-धीरे बढ़ाइए
  9. दूध, चाय और लैक्टोज़
  10. स्वीटनर: "-ol" वाले क्यों मायने रखते हैं
  11. भारतीय लेबल पर शुगर अल्कोहल कैसे पहचानें
  12. तनाव, नींद और चलना-फिरना
  13. संवेदनशील पेट के लिए घर का खाना
  14. आगे क्या पढ़ें
  15. आपकी रसोई के लिए छोटा सार
  16. स्रोत

यह गाइड सामान्य जानकारी के लिए है। अगर पेट की तकलीफ़ नई है, बदल रही है या नीचे दिए किसी खतरे के संकेत के साथ है, तो डॉक्टर को दिखाइए। कोई सख़्त डाइट शुरू करने से पहले डाइटीशियन से बात कीजिए।

IBS क्या होता है? आसान शब्दों में मतलब

अल्ट्रासाउंड हो गया, शायद एक-दो ब्लड टेस्ट भी, और हर रिपोर्ट नॉर्मल आई। लेकिन पेट का दर्द और बार-बार टॉयलेट के चक्कर रिपोर्ट नहीं पढ़ते।

फिर आप फ़ोन पर "IBS kya hota hai" टाइप करते हैं, और जवाब में डॉक्टरी अंग्रेज़ी की दीवार मिलती है। सीधी बात यह है कि IBS का फ़ुल फ़ॉर्म इरिटेबल बाउल सिंड्रोम है। डॉक्टर इसे किसी स्कैन के नतीजे से नहीं, एक पैटर्न से पहचानते हैं।

वह पैटर्न है बार-बार पेट दर्द, मल की आदत में बदलाव (दस्त, कब्ज या दोनों), और पाचन तंत्र में नुकसान या बीमारी का कोई दिखने वाला निशान नहीं [1]।

पहले डॉक्टर इसे फ़ंक्शनल गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल डिसऑर्डर में गिनते थे। अब इसे आंत और दिमाग के तालमेल की गड़बड़ी (डिसऑर्डर ऑफ़ गट-ब्रेन इंटरैक्शन) कहा जाता है [1]।

इसमें आंत ज़्यादा संवेदनशील हो जाती है और आंत की मांसपेशियाँ अलग ढंग से सिकुड़ती हैं। इसलिए सामान्य मात्रा की गैस या मल से भी दर्द हो सकता है, और खाना बहुत तेज़ या बहुत धीरे आगे बढ़ सकता है [1]।

घर के बुज़ुर्गों से आप इसके पुराने नाम भी सुन सकते हैं: स्पास्टिक कोलन, नर्वस कोलन, म्यूकस कोलाइटिस [1]। स्कैन में कुछ नहीं दिखता, इसलिए बहुत लोगों से कह दिया जाता है, "बस टेंशन है"।

लेकिन यह एक असली और आम समस्या है। इसका नाम है, इसे पहचानने का तरीका है, और उन बातों की लिस्ट भी है जिनसे मदद मिलती है।

यह IBD नहीं है: आंत में कोई नुकसान नहीं

इसमें दर्द बहुत हो सकता है, लेकिन यह पाचन तंत्र को नुकसान नहीं पहुँचाता और दूसरी बीमारियों की वजह नहीं बनता [1]। इन्फ़्लेमेटरी बाउल डिज़ीज़ (IBD) एक अलग समस्या है। जब डॉक्टर को उसका शक हो, तो कोलोनोस्कोपी उन जाँचों में से एक है जो दोनों का फ़र्क बताती है [1]।

कुल मिलाकर: आंत और दिमाग की संवेदनशील कड़ी से बना लक्षणों का एक पैटर्न, जिसमें ढूँढने पर कोई नुकसान नहीं मिलता।

भारत में IBS कितना आम है

अगर आपको लगता है कि यह सिर्फ़ आपके साथ हो रहा है, तो ऐसा नहीं है। हमने अपने ही खरीदारों से सर्वे किया, और उनमें से 19% ने बताया कि घर में कोई न कोई पाचन का ध्यान रखता है [5]।

भारत के सामुदायिक अध्ययनों में यह 0.4% से 4.2% बड़ों में मिला। शहरी मुंबई में घर-घर जाकर हुए एक शुरुआती सर्वे में यह आँकड़ा 7.2% था [2]।

हरियाणा के बल्लभगढ़ ब्लॉक में 4,767 बड़ों पर घर-घर जाकर एक अध्ययन हुआ, जिसमें यह 4% लोगों में मिला। महिलाओं में यह थोड़ा ज़्यादा था (4.8%), पुरुषों में 3.2%, और उम्र बढ़ने के साथ ज़्यादा [3]।

2023 की भारतीय कंसेंसस गाइडलाइन ने सब मिलाकर माना कि यहाँ यह पुरुषों और महिलाओं में लगभग बराबर है। क्लिनिक में आने वाले मरीज़ों में दो-तिहाई से ज़्यादा पुरुष होते हैं, शायद इसलिए कि पुरुष डॉक्टर के पास ज़्यादा जाते हैं [2]।

अमेरिका से यह बड़ा फ़र्क है। वहाँ लगभग 12% लोगों को यह होता है, और महिलाओं को पुरुषों से दो गुना तक ज़्यादा [1]।

यह सिर्फ़ महिलाओं की समस्या नहीं है, और कोई दुर्लभ समस्या भी नहीं।

IBS के तीन प्रकार

डॉक्टर आपसे पूछेंगे कि खराब दिनों में मल कैसा होता है। इसी जवाब से तय होता है कि आप तीन में से किस प्रकार में आते हैं। यह उन दिनों के पैटर्न से देखा जाता है जब कम से कम एक बार मल असामान्य हो [1]:

  • IBS-C (कब्ज वाला): एक-चौथाई से ज़्यादा बार मल सख़्त या गाँठदार, और एक-चौथाई से कम बार ढीला या पानी जैसा।
  • IBS-D (दस्त वाला): एक-चौथाई से ज़्यादा बार मल ढीला या पानी जैसा, और एक-चौथाई से कम बार सख़्त या गाँठदार।
  • IBS-M (मिला-जुला): एक-चौथाई से ज़्यादा बार सख़्त या गाँठदार, और एक-चौथाई से ज़्यादा बार ढीला या पानी जैसा।

कुछ दवाएँ सिर्फ़ एक प्रकार में काम करती हैं या दूसरे प्रकार को और बिगाड़ देती हैं, इसलिए डॉक्टर को आपका प्रकार जानना पड़ सकता है। यह गाइड दवाओं के बारे में नहीं है [1]।

भारत में यह साफ़ बँटवारा अक्सर काम नहीं करता। बहुत से मरीज़ Rome के मल वाले नियमों से किसी प्रकार में नहीं बैठते [2]।

इसलिए यहाँ डॉक्टरों को सलाह है कि वे ये बातें भी पूछें: ज़ोर लगाना, अचानक जल्दी जाने की ज़रूरत, पेट पूरा साफ़ न होने का एहसास, और आपके अपने शब्दों में मल का पैटर्न [2]।

तो डॉक्टर के पास जाने से पहले दो हफ़्ते की एक सीधी-सादी डायरी रखिए: तारीख, मल कैसा था (अपने शब्दों में), दर्द कैसा था, और आपने क्या खाया।

आईबीएस के लक्षण: रोज़ कैसा महसूस होता है

यह शायद ही कभी एक लक्षण होता है। बीच में होता है पेट दर्द, जो टॉयलेट जाने से जुड़ा है और उसके बाद कम या ज़्यादा होता है [1]।

उसके आसपास आते हैं पेट फूलना, पेट पूरा साफ़ न होने का एहसास, और कभी-कभी मल में सफ़ेद सा म्यूकस। कई महिलाओं में पीरियड्स के आसपास तकलीफ़ और बढ़ जाती है [1]।

यह एक क्रॉनिक समस्या है, यानी लंबे समय तक, अक्सर सालों तक चलती है, लेकिन लक्षण आते-जाते रहते हैं [1]।

भारत में यह अक्सर अकेले नहीं आती। बहुत से मरीज़ों में बदहज़मी (डिस्पेप्सिया) और IBS साथ-साथ होते हैं। यानी बार-बार की एसिडिटी और मल की तकलीफ़ एक ही चीज़ के दो रूप हो सकते हैं [2]।

IBS किन वजहों से बढ़ता है: इन्फ़ेक्शन, खाना और तनाव

डायग्नोसिस के बाद हर कोई पूछता है, "मैंने क्या गलत किया?" किसी एक वजह के हिसाब से देखें, तो कुछ नहीं।

इसकी कोई एक वजह नहीं मिली है, कई चीज़ों का मेल ज़्यादा संभव है [1]। इनमें हैं ज़रूरत से ज़्यादा प्रतिक्रिया देने वाली आंत-दिमाग की कड़ी, पहले हुआ पेट का इन्फ़ेक्शन, छोटी आंत में बैक्टीरिया का ज़्यादा बढ़ना, और खाने से इनटॉलरेंस [1]।

साथ ही बचपन की तनाव भरी या मुश्किल घटनाएँ, एंग्ज़ायटी या डिप्रेशन, और ऐसे जीन जो कुछ लोगों में इसका खतरा बढ़ाते हैं [1]।

इनमें से दो बातें भारत में बहुत मायने रखती हैं। यहाँ पेट के इन्फ़ेक्शन आम हैं, और किसी इन्फ़ेक्शन के बाद होने वाला IBS (पोस्ट-इन्फ़ेक्शन IBS) अच्छी तरह पहचाना जाता है। दूसरी बात FODMAP है, कार्बोहाइड्रेट का एक परिवार जिस पर हम आगे आएँगे, जो लक्षणों में भूमिका निभा सकता है [2]।

एक शहरी पैटर्न को भी ज़्यादा IBS से जोड़ा गया है: जंक और तला-भुना खाना, बहुत ज़्यादा चाय, कॉफ़ी और कोल्ड ड्रिंक, सिगरेट या तंबाकू, कम चलना-फिरना और मानसिक तनाव [2]।

यहाँ "जोड़ा गया" ही सही शब्द है। ये संबंध हैं, इस बात का सबूत नहीं कि आपकी शाम की चाय ने ही यह किया।

इसलिए कुछ भी बदलने से पहले दो हफ़्ते की डायरी में इन्हें देखिए। अंदाज़े से अक्सर दोष गलत दाल पर चला जाता है।

डॉक्टर IBS कैसे पहचानते हैं, और कब दिखाएँ

इसका कोई एक ब्लड टेस्ट नहीं है। इसीलिए नॉर्मल रिपोर्ट और असली दर्द, दोनों एक साथ सच हो सकते हैं।

पहचान पैटर्न से होती है। डॉक्टर IBS तब मान सकते हैं जब पेट दर्द के साथ इनमें से दो या ज़्यादा बातें हों: दर्द मल त्याग से जुड़ा हो, मल आने की गिनती बदल गई हो, या मल दिखने में बदल गया हो [1]।

आम नियम यह है कि पिछले 3 महीनों में हफ़्ते में कम से कम एक बार लक्षण हों, और शुरुआत कम से कम 6 महीने पहले हुई हो [1]। भारत में डॉक्टर Rome IV की जगह पुराना Rome III नियम पसंद कर सकते हैं, क्योंकि उससे ज़्यादा मरीज़ पकड़ में आते हैं [2]।

टेस्ट IBS को साबित करने के लिए नहीं, दूसरी वजहों को बाहर करने के लिए होते हैं। इनमें ब्लड और स्टूल टेस्ट हैं, और अगर तस्वीर कहीं और इशारा करे तो कभी-कभी ब्रेथ टेस्ट, एंडोस्कोपी या कोलोनोस्कोपी [1]।

यहाँ पेट के इन्फ़ेक्शन और कीड़े (पैरासाइट) आम हैं। इसलिए कोई खतरे वाली बात न हो, तब भी कुछ बुनियादी टेस्ट करवाने की सलाह दी जाती है [2]।

खतरे के संकेत, जिन पर जल्दी डॉक्टर को दिखाएँ

इन संकेतों पर इंतज़ार करने की जगह दूसरी वजहें जाँचने के लिए टेस्ट ज़रूरी हैं [2] [1]:

  • 45 की उम्र के बाद लक्षण शुरू होना
  • एनीमिया (ब्लड टेस्ट में हीमोग्लोबिन कम आना)
  • मल में खून, या काला, तारकोल जैसा मल
  • बिना कोशिश के वज़न घटना
  • ऐसे लक्षण जो रात में नींद से जगा दें
  • बुखार
  • पेट में गाँठ
  • परिवार में कोलोरेक्टल कैंसर (बड़ी आंत का कैंसर) का इतिहास

इनमें से किसी का मतलब सबसे बुरी बात नहीं है। इनका मतलब है, "इसे इसी हफ़्ते दिखाइए, अगले साल नहीं।"

FODMAP: भारतीय रसोई में वो खाना जो IBS को भड़का सकता है

तड़का लगता है, प्याज़ और लहसुन गरम तेल में जाते हैं, और रसोई घर जैसी महकने लगती है। संवेदनशील पेट वाले बहुत से लोगों के लिए यही महक एक खराब शाम की शुरुआत भी होती है।

FODMAP कार्बोहाइड्रेट का एक परिवार है जो आसानी से नहीं पचता। इनसे भरपूर खाना संवेदनशील पेट में लक्षण बढ़ा सकता है [1] [2]। अमेरिकी लिस्ट को भारतीय रसोई की नज़र से पढ़ें, तो यह कुछ ऐसी दिखती है [1]:

  • प्याज़ और लहसुन: रोज़ का तड़का, और ज़्यादातर ग्रेवी की नींव।
  • बीन्स और दालें: राजमा, चना और कई दालें।
  • फूलगोभी, पत्तागोभी और मशरूम: गोभी, पत्तागोभी की सब्ज़ी और मशरूम मसाला।
  • गेहूँ और rye अनाज: आटा, मैदा, ब्रेड, बिस्किट और गेहूँ से बनी दूसरी चीज़ें।
  • दूध और दूध से बनी चीज़ें: दूध, सॉफ़्ट चीज़, दही, कस्टर्ड और आइसक्रीम।
  • कुछ फल: सेब, आम, तरबूज़, नाशपाती और आलूबुखारा, और इनके जूस।
  • शहद, और हाई-फ़्रुक्टोज़ कॉर्न सिरप से मीठी की गई चीज़ें।
  • "-ol" वाले स्वीटनर वाली मिठाई और च्युइंग गम: सॉर्बिटॉल, मैनिटॉल, ज़ाइलिटॉल और माल्टिटॉल।
काली कड़ाही में दाल तड़का, ऊपर तला हुआ प्याज़ और लहसुन, बगल में राजमा की स्टील की कटोरी

944 मरीज़ों वाले 13 रैंडमाइज़्ड ट्रायल्स को साथ देखने पर लो FODMAP डाइट कुल लक्षणों, दर्द और पेट फूलने, तीनों में पहले नंबर पर रही। लेकिन इनमें से ज़्यादातर ट्रायल अस्पताल के क्लिनिक में हुए, और उनमें खाना वापस शुरू करने को जाँचा नहीं गया [6]।

भारत का अपना एक ट्रायल भी है। इसमें IBS-D वाले 101 लोगों को दो समूहों में बाँटा गया। एक समूह को 4 हफ़्ते सख़्त लो FODMAP डाइट और फिर धीरे-धीरे खाने की वापसी मिली, दूसरे को पारंपरिक डाइट सलाह [7]।

डाइट वाले समूह में 4 हफ़्ते पर 63% लोगों में सुधार हुआ, आम सलाह वालों में 41% में। 16 हफ़्ते पर यह 53% बनाम 31% रहा [7]।

इसकी कमी भी उसी पेपर में है। सख़्त 4 हफ़्तों में लोगों ने कम ऊर्जा, कार्बोहाइड्रेट, फ़ैट और फ़ाइबर खाया, जो खाना वापस आने पर 16 हफ़्ते तक सुधर गया [7]।

और यह डाइट कुछ लोगों की मदद करती है, सबकी नहीं। भारत में सबूत अभी कम हैं, और अलग-अलग इलाकों का खाना इतना अलग है कि और अध्ययनों की ज़रूरत है [2]।

इसलिए इसे कुछ हफ़्तों के छोटे टेस्ट की तरह चलाइए। उसके बाद खाने को एक-एक करके वापस लाइए, ताकि आपके अपने ट्रिगर पता चलें, और बेहतर हो कि यह डाइटीशियन के साथ हो [1]। इसे महीनों तक अकेले मत चलाइए।

ऊपर की अमेरिकी लिस्ट के हिसाब से, रोज़ के खाने में ये चीज़ें यहाँ छिपी होती हैं:

रोज़ का खानाइसमें FODMAP वाली चीज़ें
दाल तड़कादाल, प्याज़, लहसुन
राजमा-चावल या छोले-चावलबीन्स, प्याज़, लहसुन
रोटी, पराठा, ब्रेड, बिस्किटगेहूँ (आटा, मैदा)
चाय, खीर, मैंगो शेकदूध; शेक में आम भी
आलू गोभी, पत्तागोभी की सब्ज़ीफूलगोभी, पत्तागोभी, प्याज़
शुगर-फ़्री मिठाई या गमसॉर्बिटॉल या माल्टिटॉल जैसे "-ol" स्वीटनर

फ़ाइबर: धीरे-धीरे बढ़ाइए

"ज़्यादा फ़ाइबर खाइए", यह सलाह कब्ज वाले हर इंसान को मिलती है। IBS में यह आधी सही है।

फ़ाइबर कब्ज में आराम दे सकता है, क्योंकि यह मल को नरम और आसानी से निकलने वाला बनाता है। घुलनशील फ़ाइबर (बीन्स, फल, ओट्स) न घुलने वाले फ़ाइबर (साबुत अनाज, सब्ज़ियाँ) से ज़्यादा मददगार लगता है [1]।

दिक्कत रफ़्तार की है। एक साथ ज़्यादा फ़ाइबर गैस बनाता है, और गैस खुद लक्षण बढ़ाती है। इसलिए रोज़ लगभग 2 से 3 g बढ़ाने से पेट को आदत डालने का समय मिलता है [1]।

अंदाज़े के लिए, अमेरिका में डाइट गाइडलाइन बड़ों के लिए रोज़ 22 से 34 g फ़ाइबर बताती हैं [1]।

यहाँ एक सच्चा टकराव है। बीन्स घुलनशील फ़ाइबर वाला खाना भी हैं और FODMAP वाला भी, यानी राजमा की वही कटोरी कब्ज वाले पेट की मदद भी कर सकती है और संवेदनशील पेट को परेशान भी।

ठीक यहीं डाइटीशियन की फ़ीस वसूल होती है।

खाने से जुड़ा एक और सवाल डॉक्टर कभी-कभी उठाते हैं। IBS वाले कुछ लोगों को ग्लूटेन (गेहूँ, जौ और rye का प्रोटीन) खाने के बाद ज़्यादा तकलीफ़ होती है, सीलिएक बीमारी न होने पर भी। ऐसे में डॉक्टर कुछ समय बिना ग्लूटेन के खाकर देखने की सलाह दे सकते हैं [1]।

दूध, चाय और लैक्टोज़

ज़्यादातर भारतीय घरों में दिन में तीन कप चाय आम बात है, और हर कप में दूध होता है।

दूध FODMAP की लिस्ट में अपनी प्राकृतिक शुगर, लैक्टोज़, की वजह से है [1] [2]। भारत में इसमें इलाके का एक फ़र्क भी है: लैक्टोज़ का ठीक से न पचना उत्तर भारत की तुलना में दक्षिण भारत की आबादी में ज़्यादा आम है [2]।

दूध का स्टील का गिलास, एक सादा कार्टन, एक कप चाय और दही की छोटी कटोरी

आपके कप के लिए इसका मतलब: कुछ लोग दो हफ़्ते कम दूध या लैक्टोज़-फ़्री दूध लेकर देखते हैं कि क्या बदला। दही भी उसी लिस्ट में दूध से बनी चीज़ है, इसलिए यह मत मानिए कि दही अपने आप सुरक्षित विकल्प है [1]।

आधे दूध के साथ कड़क चाय बनाइए। इससे शाम 4 बजे वाली चाय बनी रहती है, और आप यह भी जान लेते हैं कि दूध आपका ट्रिगर है या नहीं।

स्वीटनर: "-ol" वाले क्यों मायने रखते हैं

मिठाई के डिब्बे या गम के पैक पर "शुगर-फ़्री" सुरक्षित चुनाव लगता है। संवेदनशील पेट के लिए यह उल्टा भी हो सकता है।

"-ol" पर खत्म होने वाले स्वीटनर, यानी सॉर्बिटॉल, मैनिटॉल, ज़ाइलिटॉल और माल्टिटॉल, शुगर अल्कोहल (पॉलीऑल) हैं। ये FODMAP लिस्ट में प्याज़ और दूध के साथ ही आते हैं [1]।

एक छोटे रैंडमाइज़्ड ट्रायल में सॉर्बिटॉल या मैनिटॉल की 10 g खुराक से IBS वाले 20 लोगों में पेट के लक्षण बढ़े, लेकिन 21 स्वस्थ लोगों में नहीं, चाहे शरीर ने कितना भी सोखा हो [8]।

भारत के फ़ूड रेगुलेटर ने यह बात पैक पर लिखवा दी है। FSSAI के लेबलिंग नियमों के तहत, जिस खाने में 10% या ज़्यादा पॉलीऑल हों, उस पर एक आयताकार बॉक्स में "Polyols may have laxative effect" (पॉलीऑल से पेट ढीला हो सकता है) लिखना ज़रूरी है [4]।

जिस खाने में 10% या ज़्यादा सॉर्बिटॉल हो, उस पर यह लाइन आती है: "May have laxative effect, cause bloating and diarrhea in children; and reduce calcium absorption in post-menopausal women" [4]।

मोंक फ्रूट (Siraitia grosvenorii, लुओ हान गुओ) बिल्कुल अलग तरह का स्वीटनर है। इसका एक्सट्रैक्ट हाई-इंटेंसिटी स्वीटनर है, शुगर अल्कोहल नहीं। इसकी मिठास मोग्रोसाइड्स से आती है, और यह चीनी से 100 से 250 गुना ज़्यादा मीठा है, इसलिए एक चुटकी एक चम्मच का काम कर देती है [9]।

अमेरिका के FDA ने मोंक फ्रूट एक्सट्रैक्ट और जूस कंसन्ट्रेट के सात GRAS नोटिस देखे और किसी पर कोई सवाल नहीं उठाया [10]।

इसकी सीमा यह है कि खोजने पर हमें IBS वाले लोगों में मोंक फ्रूट का कोई ट्रायल नहीं मिला। इसलिए आप इसे इसकी सामग्री देखकर चुनते हैं, IBS वाले लोगों पर हुए किसी अध्ययन के आधार पर नहीं।

विस्तार से पढ़ना हो, तो मोंक फ्रूट की सुरक्षा पर रिसर्च क्या कहती है और मोंक फ्रूट क्या है पढ़िए।

एल्यूलोज़ एक रेयर शुगर है, और पेट पर इसके असर का अपना अध्ययन है। स्वस्थ युवाओं में शरीर के वज़न के हिसाब से 0.4 g प्रति किलो तक की एक खुराक से पेट की कोई गंभीर तकलीफ़ नहीं हुई, जबकि 0.5 g प्रति किलो से गंभीर दस्त हुए [11]।

हमने जो अध्ययन पढ़ा वह IBS वाले लोगों पर नहीं था; पूरा ब्योरा हमारी एल्यूलोज़ गाइड में है।

हमारी पसंद, हमारी राय के तौर पर: अगर आप चाय या मिठाई मीठी करते हैं और "-ol" वाले समूह से दूर रहना चाहते हैं, तो बिना शुगर अल्कोहल वाला मोंक फ्रूट स्वीटनर चुनिए। और फ़ैसला पैक के सामने वाले हिस्से से नहीं, पीछे वाले हिस्से से कीजिए।

भारतीय लेबल पर शुगर अल्कोहल कैसे पहचानें

पैक को पलटिए। सामने मार्केटिंग होती है, पीछे कानून।

सामग्री बनाते समय उसके वज़न या मात्रा के हिसाब से घटते क्रम में लिखी जाती है, इसलिए जो नाम सबसे पहले है, वही सबसे ज़्यादा है [4]।

फिर तीन चीज़ें देखिए: "-itol" पर खत्म होने वाले नाम, जैसे सॉर्बिटॉल, माल्टिटॉल, ज़ाइलिटॉल, मैनिटॉल और एरिथ्रिटॉल; "polyol" शब्द; और ऊपर बताया गया आयताकार चेतावनी बॉक्स [9] [4]।

शुगर-फ़्री मिठाई और च्युइंग गम जाँचने की अच्छी जगहें हैं। सॉर्बिटॉल शुगर-फ़्री गम और कुछ फलों में मिलता है, और कैंडी और गम उन चीज़ों में हैं जिनमें "-ol" वाले स्वीटनर होते हैं [8] [1]।

जो "मोंक फ्रूट" या "स्टेविया" पाउडर चीनी की तरह चम्मच के बदले चम्मच नापा जाता है, उसे उस चम्मच को भरने के लिए कुछ चाहिए, क्योंकि एक्सट्रैक्ट की एक चुटकी से चम्मच नहीं भरता। वह चीज़ शुगर अल्कोहल हो सकती है, और सामग्री की लिस्ट में उसका नाम लिखा होगा।

स्वीटनर की सामग्री पर हमारी गाइड हर "-itol" को नाम से समझाती है।

The Sweet Change में: हमारे मोंक फ्रूट स्वीटनर में एरिथ्रिटॉल या कोई दूसरा शुगर अल्कोहल नहीं है; यह ड्रॉप्स और पाउडर में है, सैशे जल्द आएँगे। Monk Fruit Drops में तीन चीज़ें हैं: मोंक फ्रूट एक्सट्रैक्ट, पानी और विटामिन C। Monk Fruit Sweetener Powder मोंक फ्रूट, ग्वार फ़ाइबर और एल्यूलोज़ (30% / 35% / 35%) से बना है, बिना एरिथ्रिटॉल के।

तनाव, नींद और चलना-फिरना

आंत और दिमाग की कड़ी दोनों तरफ़ चलती है। इसीलिए दफ़्तर का एक खराब हफ़्ता बाथरूम में भी दिख सकता है।

ज़्यादा चलना-फिरना, जहाँ तक हो सके कम तनाव, और पूरी नींद लक्षणों में मदद कर सकते हैं [1]। भारत में काउंसलिंग और जीवनशैली में बदलाव को देखभाल का अहम हिस्सा माना जाता है, और कई ट्रायल्स में योग समेत व्यायाम उपयोगी मिला [2]।

बातचीत वाली थेरेपी भी विकल्प हैं: कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी (CBT), गट-डायरेक्टेड हिप्नोथेरेपी और रिलैक्सेशन ट्रेनिंग, और डॉक्टर आपको इनके बारे में बता सकते हैं [1]। प्रोबायोटिक्स मदद कर सकते हैं, लेकिन इन पर अध्ययन अभी चल रहे हैं, इसलिए पहले डॉक्टर से पूछिए [1] [2]।

रात के खाने के बाद 20 मिनट की सैर और सोने का एक तय समय यहाँ कोई अतिरिक्त चीज़ नहीं हैं। ये प्लान का हिस्सा हैं।

संवेदनशील पेट के लिए घर का खाना

सबसे मुश्किल हिस्सा साइंस नहीं है। मुश्किल है रविवार का राजमा, शादी का बुफ़े और दिवाली पर आया मिठाई का डिब्बा।

  • टेस्ट के दो हफ़्ते प्याज़-लहसुन के बिना तड़का: दोनों FODMAP लिस्ट में हैं, और दो हफ़्ते फ़र्क देखने के लिए काफ़ी हैं।
  • राजमा, छोले और दाल थोड़ी मात्रा में, बंद नहीं: पूरी तरह बंद करने से आधी कटोरी बेहतर टेस्ट है।
  • एक बार में एक बदलाव, लिखकर: इस पखवाड़े तड़का बदलिए, अगले में दूध। दोनों एक साथ बदलेंगे, तो कभी पता नहीं चलेगा कि असर किसका था।
  • मीठी चीज़ें जाँचिए: शुगर-फ़्री मिठाई और गम में ऊपर बताए "-ol" वाले नाम देखिए।
  • त्योहार का खाना सच में मुश्किल है: छोटी प्लेट लीजिए, जिस डिश पर शक है उसे दोबारा मत लीजिए, और एक खराब दिन को अपनी डायरी पर भारी मत पड़ने दीजिए।

प्याज़ के बिना एक-दो हफ़्ते दाल का स्वाद अलग लगेगा। आपके पेट का जवाब दो हफ़्ते की फीकी दाल के लायक है।

आगे क्या पढ़ें

यह पेज इस विषय का मुख्य पेज है। नीचे की हर लाइन उन सवालों में से एक है जिन तक यह ले जाता है, उसी क्रम में जिसमें ज़्यादातर लोग इनसे मिलते हैं।

  • कब्ज वाला प्रकार और भारत में मल के नियम: यहाँ इतने मरीज़ तीन प्रकारों से बाहर क्यों रह जाते हैं।
  • IBS किन वजहों से बढ़ता है: इन्फ़ेक्शन, FODMAP, तनाव और शहरी पैटर्न, विस्तार से।
  • डॉक्टर कौन-से टेस्ट करवा सकते हैं: हर टेस्ट किस चीज़ को बाहर करता है।
  • लो FODMAP डाइट प्लान: टेस्ट के हफ़्ते और खाने की वापसी, डिश दर डिश।
  • योग और पेट: भारतीय ट्रायल्स में क्या मिला।
  • संवेदनशील पेट में मोंक फ्रूट, एल्यूलोज़ और आर्टिफ़िशियल स्वीटनर: किस पर अध्ययन हुआ है और किस पर नहीं।
  • पेट के लिए डाइट चार्ट: ऊपर की लिस्ट पर बना एक हफ़्ते का खाना।

स्वीटनर वाले पहलू के लिए, स्वीटनर पर हमारी गाइड हर तरह के स्वीटनर को समझाती है, शुगर अल्कोहल भी।

मोंक फ्रूट स्वीटनर, ड्रॉप्स और पाउडर में, सैशे जल्द आ रहे हैं। इसमें एरिथ्रिटॉल या कोई दूसरा शुगर अल्कोहल नहीं है। मोंक फ्रूट स्वीटनर देखिए

आपकी रसोई के लिए छोटा सार

चीट शीट

  • IBS एक पैटर्न है, नुकसान नहीं: टेस्ट नॉर्मल, फिर भी पेट दर्द और मल की बदली आदत; भारत में आम, और पुरुषों में भी उतना ही जितना महिलाओं में।
  • कुछ भी बंद करने से पहले अपने ट्रिगर ढूँढिए: दो हफ़्ते खाने, नींद और तनाव की डायरी, फिर एक बार में एक बदलाव।
  • अपनी रसोई में FODMAP लिस्ट पहचानिए: प्याज़-लहसुन का तड़का, राजमा और दाल, आटा, दूध, आम और शहद, और "-ol" वाले स्वीटनर।
  • फ़ाइबर चम्मच-चम्मच करके: रोज़ कुछ ग्राम ज़्यादा, पहले घुलनशील, कभी एक साथ थाली भर नहीं।
  • पैक का पिछला हिस्सा पढ़िए: "-itol" वाले नाम और "Polyols may have laxative effect" वाला बॉक्स; और किसी भी खतरे के संकेत पर डॉक्टर को दिखाइए।

IBS एक असली समस्या है जिसकी भारत में लंबी कहानी है, और जो चीज़ें मदद करती हैं उनमें से ज़्यादातर आपकी अपनी रसोई और अपनी डायरी से शुरू होती हैं।

लोग अक्सर पूछते हैं

आईबीएस क्या है?

सीधी बात: IBS यानी इरिटेबल बाउल सिंड्रोम पेट की लंबी चलने वाली समस्या है, जिसमें पेट दर्द के साथ मल की आदत बदलती है और जाँच में कोई नुकसान नहीं दिखता। अमेरिका का NIDDK इसे आंत और दिमाग के तालमेल की गड़बड़ी कहता है। 2023 की भारतीय गाइडलाइन के मुताबिक़ यह सौ में लगभग चार बड़ों तक में मिलता है।

IBS किन वजहों से बढ़ सकता है?

कोई एक वजह नहीं मिली है; अमेरिका का NIDDK संवेदनशील आंत-दिमाग की कड़ी, पुराना पेट का इन्फ़ेक्शन, छोटी आंत में बैक्टीरिया, खाने से इनटॉलरेंस, बचपन का तनाव, एंग्ज़ायटी और जीन गिनाता है। 2023 की भारतीय गाइडलाइन इसमें इन्फ़ेक्शन के बाद वाला IBS, FODMAP खाना और जंक फ़ूड, चाय-कॉफ़ी, सिगरेट, कम चलना-फिरना और तनाव वाला शहरी पैटर्न जोड़ती है।

IBS में कौन-से फल खा सकते हैं?

सुरक्षित फलों की लिस्ट से नहीं, टेस्ट करने वाली लिस्ट से शुरू कीजिए। अमेरिका का NIDDK सेब, खुबानी, चेरी, आम, नाशपाती, आलूबुखारा और तरबूज़ जैसे फलों को, इनके जूस समेत, FODMAP फल मानता है। कौन-से फल आपको सूट करते हैं, यह उन्हें एक-एक करके वापस खाने से पता चलता है, बेहतर हो कि डाइटीशियन के साथ।

IBS में कौन-सा दूध ठीक है?

अमेरिका के NIDDK की FODMAP लिस्ट में दूध उसकी शुगर, लैक्टोज़, की वजह से है, और भारत की 2023 की गाइडलाइन कहती है कि लैक्टोज़ न पचना दक्षिण भारत में ज़्यादा आम है। दही और आइसक्रीम भी उसी लिस्ट में हैं। कुछ लोग दो हफ़्ते चाय में कम दूध या लैक्टोज़-फ़्री दूध लेकर देखते हैं कि क्या बदला।

IBS में कौन-सा स्वीटनर ठीक है?

"-ol" वाले शुगर अल्कोहल FODMAP लिस्ट में हैं, और FSSAI के लेबलिंग नियम इनसे भरपूर खाने पर "Polyols may have laxative effect" वाला बॉक्स लगवाते हैं। मोंक फ्रूट एक्सट्रैक्ट शुगर अल्कोहल नहीं है, इसलिए हमारी पसंद बिना शुगर अल्कोहल वाला मोंक फ्रूट स्वीटनर है। IBS वाले लोगों में मोंक फ्रूट का कोई ट्रायल हमें नहीं मिला।

IBS में पेट फूलने पर क्या मदद करता है?

दो कदमों को अच्छा सपोर्ट मिला है। 2022 की रैंडमाइज़्ड ट्रायल्स की एक समीक्षा में लो FODMAP डाइट पेट फूलने में पहले नंबर पर रही; इसे डाइटीशियन के साथ कुछ हफ़्ते चलाकर फिर खाना एक-एक करके वापस लाते हैं। अमेरिका का NIDDK फ़ाइबर धीरे-धीरे, रोज़ कुछ ग्राम बढ़ाने की सलाह देता है, ताकि पेट गैस से न भरे।

आईबीएस का इलाज कैसे किया जाता है?

कोई एक सबसे अच्छा तरीका नहीं है। अमेरिका का NIDDK खाने में बदलाव, ज़्यादा फ़ाइबर, लो FODMAP डाइट या कुछ समय बिना ग्लूटेन के खाकर देखना, चलना-फिरना, कम तनाव, पूरी नींद और बातचीत वाली थेरेपी बताता है; भारत की 2023 गाइडलाइन काउंसलिंग और योग जैसा व्यायाम जोड़ती है। कुछ प्रकारों के लिए दवाएँ हैं, वह हिस्सा आपके डॉक्टर का है।

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Kapil Groverr

लेखक
Kapil Groverr · चीफ़ बिज़नेस ऑफ़िसर और को-फ़ाउंडर

IIM लखनऊ के पूर्व छात्र · मार्केटिंग में 18 साल

Kapil Groverr, The Sweet Change के को-फ़ाउंडर और चीफ़ बिज़नेस ऑफ़िसर हैं, जहाँ वे ग्रोथ और मार्केटिंग देखते हैं। उन्हें मार्केटिंग में 18 साल का अनुभव है। हाल में वे Breathe Well-being में वाइस प्रेसिडेंट मार्केटिंग थे, और उससे पहले King Koil में हेड ऑफ़ डिजिटल मार्केटिंग। IIM लखनऊ के पूर्व छात्र, वे हमारी स्वीटनर गाइड और तुलनाएँ लिखते हैं।

Writes about: स्वीटनर गाइड और तुलनाएँ

Disclosure: The Sweet Change के को-फ़ाउंडर

Jatin Agnihotri

रिव्यूअर
Jatin Agnihotri · COO और को-फ़ाउंडर

MBA, Indian School of Business · टेक्नोलॉजी और सिक्योरिटी में 12 साल

Jatin Agnihotri The Sweet Change के COO और को-फ़ाउंडर हैं। वे ऑपरेशंस संभालते हैं, मैन्युफ़ैक्चरर और वेंडर से लेकर शिपिंग और लॉजिस्टिक्स तक, और हमारे Instagram के लिए कंटेंट बनाते हैं। उन्होंने 12 साल टेक्नोलॉजी में काम किया है: Honda Cars India, Extramarks Education (जहाँ वे Vice President IT थे) और Jio Platforms में। उनके पास ISB से MBA है।

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Manvi Agnihotri

मेडिकल रिव्यू:
Manvi Agnihotri · CEO और को-फ़ाउंडर

क्लिनिकल न्यूट्रिशन में 12 साल, 11,000 से ज़्यादा मरीज़ · फ़ूड एंड न्यूट्रिशन में M.Sc, सिल्वर मेडलिस्ट

Manvi Agnihotri, The Sweet Change की CEO और को-फ़ाउंडर हैं। उन्होंने फ़ूड एंड न्यूट्रिशन में M.Sc किया है, जिसमें वे सिल्वर मेडलिस्ट रहीं। डायबिटीज केयर प्रोग्राम Breathe Well-being में उन्होंने ब्रांड स्ट्रैटेजी और मरीज़ों व डॉक्टरों को जानकारी देने का काम संभाला। वे हमारे हेल्थ और न्यूट्रिशन पेज लाइव होने से पहले रिव्यू करती हैं।

Writes about: न्यूट्रिशन और फ़ूड साइंस, ब्लड शुगर और डायबिटीज डाइट

Disclosure: The Sweet Change की को-फ़ाउंडर

स्रोत

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