सेडेंटरी लाइफस्टाइल (Sedentary Lifestyle) क्या है और शरीर पर इसका असर

डेस्क से पीछे खिसकी एक खाली ऑफ़िस कुर्सी, हल्के रंग की डेस्क पर बंद लैपटॉप और स्टील के गिलास में चाय, फ़र्श पर वॉकिंग शूज़

सेडेंटरी लाइफस्टाइल का मतलब है जागते हुए ज़्यादातर घंटे बैठे या टेक लगाए रहना, जिसमें शरीर बहुत कम एनर्जी खर्च करता है और बीच में हिलना-डुलना कम होता है [1]। लंबे समय तक बैठे रहने का संबंध दिल की बीमारी, टाइप 2 डायबिटीज, कुछ कैंसर और जल्दी मौत के ज़्यादा जोखिम से पाया गया है [1]। ज़्यादा एक्टिव रहने से यह संबंध कमज़ोर पड़ता है, और हर उम्र में कम बैठने की सलाह दी जाती है [2][3]।

डाइट बदलने से पहले अपने डॉक्टर या डाइटिशियन से बात करें, खासकर अगर आप डायबिटीज की दवा लेते हैं।

इस पेज पर
  1. सेडेंटरी लाइफस्टाइल का मतलब, आसान शब्दों में
  2. क्या आपका दिन सेडेंटरी है? एक छोटी-सी जांच
  3. सेडेंटरी लाइफस्टाइल का शरीर पर असर
  4. भारत के आंकड़े क्या दिखाते हैं
  5. क्या एक्सरसाइज़ दिन भर बैठने की भरपाई कर देती है?
  6. काम के दौरान छोटे ब्रेक जो मदद करते हैं
  7. घर पर और वीकेंड पर
  8. डेस्क-डे की खाने की आदतें जो बैठने के साथ आती हैं
  9. कम बैठना, इसी हफ़्ते से
  10. स्रोत
  • यह क्या है: जागते हुए ज़्यादातर घंटे बैठे या टेक लगाए रहना, बहुत कम एनर्जी खर्च के साथ [1]।
  • कोई सुरक्षित संख्या नहीं: WHO हर उम्र में कम बैठने की सलाह देता है, लेकिन बैठने के घंटों की कोई सुरक्षित संख्या तय नहीं करता [3]।
  • भारत की तस्वीर: सर्वे वाले भारत के चार इलाकों में आधे से ज़्यादा वयस्क इनएक्टिव थे, शहरों में और भी ज़्यादा [4]।
  • एक्सरसाइज़ मदद करती है: एक पूल्ड एनालिसिस में, रोज़ करीब 60 से 75 मिनट की मॉडरेट एक्टिविटी लंबे समय तक बैठने से जुड़े जोखिम की भरपाई करती दिखी [2]।
  • ब्रेक भी गिने जाते हैं: एक छोटे ट्रायल में, हर 20 मिनट पर 2 मिनट की वॉक से एक टेस्ट ड्रिंक के बाद ब्लड शुगर का बढ़ना कम हुआ [5]।

यह आम जानकारी है। अगर आपको दिल, जोड़ों या ब्लड शुगर की कोई समस्या है, या आप काफ़ी समय से एक्टिव नहीं रहे हैं, तो कोई नया एक्टिविटी रूटीन शुरू करने से पहले अपने डॉक्टर से पूछ लें।

सेडेंटरी लाइफस्टाइल का मतलब, आसान शब्दों में

कल का दिन याद कीजिए। सुबह 9:30 से शाम 6 बजे तक डेस्क की कुर्सी, फिर कैब या मेट्रो से घर, फिर डिनर और सोफ़े पर एक घंटा फ़ोन या OTT। जोड़कर देखिए, जागते हुए दिन का ज़्यादातर हिस्सा बैठे-बैठे निकला।

अगर आपने "sedentary lifestyle meaning in Hindi" खोजा है, तो जवाब यह है: सेडेंटरी लाइफस्टाइल वह है जिसमें जागते हुए ज़्यादातर समय बैठने या टेक लगाने में जाता है और शरीर बहुत कम एनर्जी खर्च करता है, यानी 1.5 METs या उससे कम [1]।

MET (मेटाबॉलिक इक्विवेलेंट) एनर्जी खर्च की एक इकाई है, जिसमें 1 MET उतना है जितना आप आराम करते हुए खर्च करते हैं। हल्की एक्टिविटी करीब 1.6 से 2.9 METs की होती है, मॉडरेट 3 से 5.9 की, और विगरस (तेज़) 6 और उससे ऊपर की [1]।

इसलिए कंप्यूटर पर काम, TV, क्लास या ऑफ़िस में बैठना, और आने-जाने में बैठे रहना, सब सेडेंटरी टाइम में गिना जाता है [1]। नींद इसमें नहीं गिनी जाती, क्योंकि यह परिभाषा सिर्फ़ जागते घंटों की है। या जैसा कोई साथी चाय पर कहेगा: दिन का ज़्यादा टाइम बैठ के निकल गया।

यहीं बहुत से लोग चूक जाते हैं। फ़िज़िकली इनएक्टिव होने का मतलब है कि आप हफ़्ते की एक्टिविटी गाइडलाइन तक नहीं पहुंचते, जबकि सेडेंटरी होना इस बारे में है कि आप कितनी देर बैठते हैं [6]। आप हर सुबह तेज़ वॉक करके भी उसके बाद दस घंटे बैठे रह सकते हैं, यानी एक ही इंसान एक ही दिन में एक्टिव भी हो सकता है और सेडेंटरी भी।

क्या आपका दिन सेडेंटरी है? एक छोटी-सी जांच

ज़्यादातर लोग अपना अंदाज़ा कम लगाते हैं। एक आम वर्किंग डे को याद कीजिए और ईमानदारी से जवाब दीजिए:

  • काम पर: डेस्क पर आपके ज़्यादातर घंटे बैठे-बैठे निकलते हैं, मीटिंग्स समेत।
  • आना-जाना: ऑफ़िस आने-जाने का सफ़र कार, कैब, बस या मेट्रो में बैठकर कटता है।
  • शाम: डिनर और सोने के बीच का ज़्यादातर समय TV, OTT या फ़ोन में जाता है।
  • उठना: अक्सर आप नज़र उठाकर देखते हैं कि कुर्सी छोड़े बिना एक-दो घंटे निकल गए।
  • कदम: आम दिन में कैंटीन या पार्किंग तक के अलावा आप बहुत कम चलते हैं।

अगर इनमें से ज़्यादातर बातें आपके दिन जैसी लगती हैं, तो आपका दिन ज़्यादातर सेडेंटरी है। बहुत सी ऑफ़िस और वर्क-फ़्रॉम-होम नौकरियों में यही होता है, और इस पेज का बाकी हिस्सा इसी माहौल के बारे में है। डेस्क वाली ज़िंदगी, खाने और चलने-फिरने पर और पढ़ने के लिए हमारी रोज़ की सेहत वाली गाइड्स देखिए।

बैठने के घंटों की कोई तय सुरक्षित संख्या नहीं है। WHO की 2020 की गाइडलाइन हर उम्र और क्षमता के लोगों को बैठना कम करने की सलाह देती है, लेकिन कहती है कि घंटों में कोई सीमा तय करने के लिए सबूत काफ़ी नहीं थे [3]।

शायद आप यह दिन अपने शरीर में पहले से महसूस करते हों: शाम तक अकड़ी हुई पीठ, लंच के बाद भारीपन, कमर पर पैंट जो थोड़ी टाइट लगती है। अगला हिस्सा इस बारे में है कि रिसर्च लंबे समय तक बैठने को किन चीज़ों से जोड़ती है।

सेडेंटरी लाइफस्टाइल का शरीर पर असर

लंबे समय तक बैठे रहना पूरे शरीर की दिक्कतों से जुड़ा पाया गया है, दिल और ब्लड शुगर से लेकर हड्डियों और मूड तक।

सेडेंटरी लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियों की लिस्ट लंबी है: किसी भी वजह से मौत का ज़्यादा जोखिम (ऑल-कॉज़ मॉर्टैलिटी), दिल की बीमारी, टाइप 2 डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, खून में फ़ैट का बिगड़ा लेवल, कुछ कैंसर, जोड़ों का दर्द, ऑस्टियोपोरोसिस, डिप्रेशन और, कम पक्के तौर पर, सोचने-समझने की क्षमता में कमी (कॉग्निटिव इम्पेयरमेंट) [1]। रोज़ बैठने का कुल समय जितना बढ़ता है, नुकसान भी उतना बढ़ता दिखता है [1]।

इन सब में दो शब्द अहम हैं: "linked with", यानी "जुड़ा हुआ"। सेडेंटरी लाइफस्टाइल के ये जोखिम बड़ी आबादी में देखे गए संबंध हैं। यह इस बात का सबूत नहीं है कि इनमें से हर बीमारी अकेले बैठने से ही होती है।

दिल, ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल

जब आप देर तक बैठते हैं, तो शरीर की एनर्जी की मांग घट जाती है, और दिल शरीर में कम खून पंप करता है [1]। लंबे समय तक बैठने का संबंध हाई ब्लड प्रेशर और ब्लड फ़ैट के बदलावों से है: ज़्यादा ट्राइग्लिसराइड्स और कम HDL, यानी "अच्छा" कोलेस्ट्रॉल [1]।

इसलिए डिनर के बाद सोफ़े पर बिताए घंटे भी उसी गिनती में आते हैं जिसमें डेस्क के घंटे।

ब्लड शुगर और टाइप 2 डायबिटीज

घंटों बिना हिले बैठे रहने से मांसपेशियों के वे एंज़ाइम और ट्रांसपोर्टर धीमे पड़ जाते हैं जो फ़ैट और ग्लूकोज़ को संभालते हैं। इससे दोनों का मेटाबॉलिज़्म धीमा होता है, और शरीर इंसुलिन के प्रति कम सेंसिटिव हो जाता है [1]। यह भी एक वजह है कि लंबे समय तक बैठने को टाइप 2 डायबिटीज से जोड़ा जाता है।

अगर आपको प्रीडायबिटीज है या परिवार में डायबिटीज रही है, तो अपने डॉक्टर से पूछिए कि आपके लिए किस तरह की एक्टिविटी ठीक है।

वज़न

बैठे रहने का संबंध मोटापे से है, और जिन लोगों का वज़न ज़्यादा होता है वे भी कम हिलते-डुलते हैं [1]। ये दोनों आपस में कैसे जुड़े हैं, यह अभी समझा जा रहा है [1]।

हड्डियां, मांसपेशियां और जोड़

फ़िज़िकल इनएक्टिविटी से हड्डियों की मिनरल डेंसिटी घटती है, और लंबे समय तक बैठने का संबंध ऑस्टियोपोरोसिस और घुटने के दर्द जैसी जोड़ों की दिक्कतों से है [1]।

मूड और नींद

पैसिव तरीके से बैठना, जैसे TV देखना, डिप्रेशन के ज़्यादा जोखिम से जुड़ा है, जबकि ऐसा बैठना जिसमें दिमाग काम में लगा रहे, जैसे पढ़ना, उसमें कोई साफ़ संबंध नहीं दिखा [1]। फ़िज़िकल एक्टिविटी उल्टी दिशा में काम करती है: वयस्कों में यह डिप्रेशन और एंग्ज़ायटी के लक्षण कम करती है और मानसिक सेहत और नींद बेहतर करती है [6]।

भारत के आंकड़े क्या दिखाते हैं

अगर यह पश्चिमी देशों की ऑफ़िस वाली समस्या लगती है, तो भारत का अपना डेटा कुछ और कहता है। 2014 में छपे ICMR-INDIAB सर्वे में तमिलनाडु, महाराष्ट्र, झारखंड और चंडीगढ़ के 14,227 वयस्कों में से 54.4% इनएक्टिव थे [4]।

इनएक्टिविटी गांवों से ज़्यादा शहरों में थी, 65.0% बनाम 50.0%, और पुरुष महिलाओं से ज़्यादा एक्टिव थे [4]। दायरा ध्यान में रखिए: ये सर्वे के पहले फ़ेज़ के चार इलाके हैं, और फ़ील्डवर्क एक दशक से ज़्यादा पुराना है, इसलिए यह आज के पूरे भारत का आंकड़ा नहीं है।

दुनिया भर में करीब 31% वयस्क, यानी 1.8 अरब लोग, हफ़्ते की न्यूनतम एक्टिविटी नहीं कर पाते [6]। आपके लिए इसका मतलब: लंबे सफ़र और स्क्रीन से भरी शामों वाली शहर की डेस्क जॉब में सेडेंटरी लाइफस्टाइल में फिसलना आसान है।

क्या एक्सरसाइज़ दिन भर बैठने की भरपाई कर देती है?

सुबह 6 बजे वॉक की, फिर नौ घंटे बैठे रहे। असली सवाल यह है कि क्या वह वॉक कुर्सी के घंटों की भरपाई करती है।

10 लाख से ज़्यादा वयस्कों के एक पूल्ड एनालिसिस में, रोज़ करीब 60 से 75 मिनट की मॉडरेट एक्टिविटी से लंबे समय तक बैठने से जुड़ा मौत का ज़्यादा जोखिम खत्म होता दिखा [2]।

यही एक्टिविटी ज़्यादा TV देखने से जुड़े जोखिम को कम तो करती दिखी, पर खत्म नहीं कर पाई: सबसे एक्टिव लोगों में भी रोज़ 5 या ज़्यादा घंटे TV देखने पर जोखिम ज़्यादा रहा [2]।

इसमें कुछ पेच हैं। डेटा ऑब्ज़र्वेशनल स्टडीज़ से आया, ज़्यादातर हाई-इनकम देशों में, इसलिए यह एक संबंध दिखाता है, सबूत नहीं [2]। और डेस्क जॉब के साथ रोज़ एक घंटा या उससे ज़्यादा तेज़ एक्टिविटी फ़िट करना काफ़ी बड़ी बात है।

गाइडलाइन का बेसलाइन छोटा है: हफ़्ते में 150 से 300 मिनट मॉडरेट एक्टिविटी, या 75 से 150 मिनट विगरस एक्टिविटी, साथ में मांसपेशियां मज़बूत करने वाली एक्सरसाइज़ [3]। यह हफ़्ते में पांच दिन करीब 30 मिनट तेज़ चलने के बराबर है।

तो सबक एक नहीं, दो आदतें हैं: ज़्यादा चलिए-फिरिए, और कम बैठिए। अगर आपको दिल की कोई समस्या है, तो एक्टिविटी बढ़ाने से पहले अपने डॉक्टर से पूछिए कि आपके लिए कितनी एक्टिविटी ठीक है।

काम के दौरान छोटे ब्रेक जो मदद करते हैं

अगर आपका बैठना डेस्क जॉब के साथ आता है, तो इसका ज़्यादातर हिस्सा वर्किंग डे में होता है, इसलिए छोटे बदलाव भी वहीं जुड़ते जाते हैं।

45 से 65 साल के 19 ओवरवेट या मोटापे वाले वयस्कों पर एक छोटे लैब ट्रायल में, हर 20 मिनट पर उठकर 2 मिनट हल्का चलने से एक टेस्ट ड्रिंक के बाद ब्लड शुगर और इंसुलिन का बढ़ना कम हुआ, लगातार बैठे रहने की तुलना में [5]।

यह एक छोटी लैब स्टडी है, इसलिए यह महीनों या सालों के बारे में कुछ नहीं बताती। हां, इससे इतना ज़रूर लगता है कि कुर्सी के बीच के ये ब्रेक आज़माने लायक हैं, शाम की वॉक के साथ-साथ।

डेस्क वाले दिन में वॉकिंग ब्रेक जोड़ने के तरीके:

  • एक रिमाइंडर: फ़ोन या लैपटॉप पर हर 30 या 45 मिनट का रिमाइंडर लगाइए, और बजते ही खड़े हो जाइए।
  • खड़े होकर कॉल: फ़ोन कॉल खड़े होकर या चलते हुए लीजिए; कैमरा बंद वाली कॉल वॉकिंग कॉल बन सकती है।
  • कैंटीन तक सीढ़ियां: एक-दो मंज़िल के लिए लिफ़्ट की जगह सीढ़ियां लीजिए।
  • चलकर जाइए: मैसेज भेजने की जगह साथी की डेस्क तक जाइए।
  • लंच वॉक: लंच के बाद दोबारा बैठने से पहले 10 मिनट चलिए।
  • कूल्हों और पीठ के लिए स्ट्रेच: हर घंटे एक बार खड़े होइए, हाथ ऊपर कीजिए और धीरे से कमर घुमाइए।
  • स्टैंडिंग डेस्क, अगर है तो: दिन भर बैठने और खड़े होने के बीच बदलते रहिए।

डेस्क वाले दिन टिफ़िन में क्या है, यह भी मायने रखता है, और हमारे ऑफ़िस लंच आइडियाज़ ठीक इसी तरह के दिन के लिए बने हैं।

घर पर और वीकेंड पर

सेडेंटरी लाइफस्टाइल में शाम दिन की दूसरी लंबी बैठक होती है, और अक्सर इसे बदलना ज़्यादा आसान होता है, क्योंकि तब कोई घड़ी नहीं देख रहा होता।

  • घर के काम भी मूवमेंट हैं: खाना बनाना, झाड़ू लगाना, कपड़े तह करना और पौधों में पानी देना, सब आपको सोफ़े से उठाते हैं।
  • डिनर के बाद की वॉक: डिनर के बाद मोहल्ले का एक चक्कर लगाने की परिवार की पुरानी आदत वापस लाने लायक है।
  • ब्रेक के साथ स्क्रीन: एपिसोड के बीच खड़े हो जाइए, या मैच के दौरान हर बार ऐड आने पर।
  • वीकेंड का एक एक्टिव प्लान: पार्क में सुबह की सैर, बैडमिंटन का एक गेम, या पैदल बाज़ार जाना।

इसका हर हिस्सा गिना जाता है, क्योंकि थोड़ा मूवमेंट भी कुछ न करने से बेहतर है [6]। एक्सरसाइज़ वाले हिस्से की हफ़्ते की गाइडलाइन ऐसे छोटे-छोटे टुकड़ों में पूरी करना आसान है।

सारे बदलाव एक जगह:

डेस्क-डे का बदलावकिसकी जगह
खड़े होकर कॉल लेनाकुर्सी पर बैठकर कॉल लेना
लंच के बाद वॉकलंच के बाद फ़ोन
सीढ़ियांलिफ़्ट
कम चम्मच चीनी वाली चायदो चम्मच चीनी वाली चाय

डेस्क-डे की खाने की आदतें जो बैठने के साथ आती हैं

सेडेंटरी लाइफस्टाइल अक्सर अकेले नहीं आती। ऑफ़िस में चाय का दौर 11 बजे आता है और फिर 4 बजे, साथ में बिस्किट, और किसी का बर्थडे हो तो मिठाई का डिब्बा एक डेस्क से दूसरी डेस्क घूमता है।

अपने ही खरीदारों के हमारे सर्वे में, 64% ने कहा कि उनका स्वीटनर चाय में जाता है और 66% ने कहा कि कॉफ़ी में [7]। तो बहुत से डेस्क-डे में शुरुआत के लिए सबसे आसान जगह कप ही है।

  • कम चम्मच: इस हफ़्ते हर कप में एक चम्मच चीनी कम कीजिए, और अगले महीने एक और।
  • शाम 4 बजे का स्लॉट: बिस्किट की जगह मुट्ठी भर भुने चने, एक कटोरी कटे फल या कुछ नट्स।
  • डेस्क के पास पानी: सामने दिखने वाली एक बोतल, जिसे आप लंच पर दोबारा भरें, आपको उठने की एक वजह भी देती है।
  • मिठाई वाले दिन: एक पीस लीजिए, फिर डिब्बा खुद अगली डेस्क तक ले जाइए।

The Sweet Change में, हम एक मोंक फ्रूट स्वीटनर बनाते हैं जिसमें न एरिथ्रिटॉल है, न कोई और शुगर अल्कोहल। यह ड्रॉप्स और पाउडर में आता है, और सैशे जल्द आ रहे हैं। इससे ऑफ़िस की चाय मीठी रहती है, जबकि चीनी वाली चम्मच डिब्बे में ही रहती है।

कम बैठना, इसी हफ़्ते से

सेडेंटरी लाइफस्टाइल आम घंटों से बनती है: डेस्क, आना-जाना, सोफ़ा। आपको इन सबको एक साथ बदलने की ज़रूरत नहीं है। काम पर एक ब्रेक और शाम की एक आदत चुनिए, और उन्हें एक महीने तक निभाइए।

चीट शीट

  • अपना बैठना पहचानिए: डेस्क के घंटे, आना-जाना और शाम की स्क्रीन, सब सेडेंटरी टाइम में गिने जाते हैं।
  • कोई सुरक्षित घंटे नहीं: कोई तय सुरक्षित सीमा नहीं है, इसलिए अभी जितना बैठते हैं उससे कम बैठने का लक्ष्य रखिए।
  • बैठना तोड़िए: काम पर हर आधे घंटे या उसके आसपास दो-एक मिनट खड़े होइए या चलिए।
  • एक्टिविटी टुकड़ों में जोड़िए: लंच वॉक, सीढ़ियां और डिनर के बाद की वॉक, सब हफ़्ते की गाइडलाइन में गिने जाते हैं।
  • कप से शुरू कीजिए: ऑफ़िस की चाय से एक चम्मच चीनी कम कीजिए, और शाम 4 बजे के बिस्किट की जगह भुने चने लीजिए।

मोंक फ्रूट स्वीटनर, ड्रॉप्स और पाउडर में, सैशे जल्द आ रहे हैं। इसमें न एरिथ्रिटॉल है, न कोई और शुगर अल्कोहल। मोंक फ्रूट स्वीटनर देखिए

इस पेज पर हमारे स्वीटनर का ज़िक्र The Sweet Change Monk Fruit Drops और Powder बनाने वालों के तौर पर हमारी राय है। यह पेज मेडिकल सलाह नहीं है: अगर आपको कोई हेल्थ कंडीशन है या आप दवा लेते हैं, तो खाने-पीने या एक्टिविटी में बदलाव से पहले अपने डॉक्टर से बात करें।

लोग अक्सर पूछते हैं

Sedentary lifestyle kya hai?

आसान शब्दों में, इसका मतलब है दिन का ज़्यादातर हिस्सा बैठे-बैठे बिताना: डेस्क पर, कैब या मेट्रो में, और स्क्रीन के सामने सोफ़े पर, बीच में बहुत कम हिलना-डुलना। WHO सेडेंटरी बिहेवियर को जागते हुए कम एनर्जी वाला समय बताता है, जैसे बैठना, टेक लगाकर बैठना या लेटना, और वयस्कों को इसे कम करने की सलाह देता है।

कितने घंटे बैठना बहुत ज़्यादा है?

बैठने के घंटों की कोई तय सुरक्षित संख्या नहीं है। WHO की 2020 की गाइडलाइन हर उम्र के वयस्कों को बैठना कम करने की सलाह देती है, लेकिन कहती है कि घंटों में सीमा तय करने के लिए सबूत काफ़ी मज़बूत नहीं थे। एक व्यावहारिक लक्ष्य है: अभी जितना बैठते हैं उससे कम बैठिए, और लंबी बैठकों को दिन भर छोटी-छोटी वॉक से तोड़िए।

सेडेंटरी लाइफस्टाइल के नुकसान क्या हैं?

लंबे समय तक बैठने का संबंध जल्दी मौत, दिल की बीमारी, टाइप 2 डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, खून में फ़ैट के बिगड़े लेवल, कुछ कैंसर, ऑस्टियोपोरोसिस, जोड़ों के दर्द और डिप्रेशन के ज़्यादा जोखिम से है। सबूतों के 2020 के एक रिव्यू में पाया गया कि बैठने का कुल समय बढ़ने के साथ ये नुकसान बढ़ते जाते हैं। ये बड़ी आबादी पर हुई स्टडीज़ से मिले संबंध हैं, वजह का सबूत नहीं।

दिन भर बैठे रहने से कौन सी बीमारियां जुड़ी हैं?

रिसर्च लंबे समय तक बैठने को बीमारियों से जोड़ती है, यह साबित नहीं करती कि बैठना ही उनकी वजह है। वयस्कों में सबसे साफ़ संबंध दिल की बीमारी, टाइप 2 डायबिटीज और कुछ कैंसर से हैं, जिन्हें WHO सेडेंटरी टाइम के बुरे नतीजों में गिनता है। 2020 का एक रिव्यू इसमें हाई ब्लड प्रेशर, ऑस्टियोपोरोसिस और डिप्रेशन जोड़ता है, और रोज़ बैठने का समय बढ़ने के साथ जोखिम भी बढ़ते हैं।

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Jatin Agnihotri

लेखक
Jatin Agnihotri · COO और को-फ़ाउंडर

MBA, Indian School of Business · टेक्नोलॉजी और सिक्योरिटी में 12 साल

Jatin Agnihotri The Sweet Change के COO और को-फ़ाउंडर हैं। वे ऑपरेशंस संभालते हैं, मैन्युफ़ैक्चरर और वेंडर से लेकर शिपिंग और लॉजिस्टिक्स तक, और हमारे Instagram के लिए कंटेंट बनाते हैं। उन्होंने 12 साल टेक्नोलॉजी में काम किया है: Honda Cars India, Extramarks Education (जहाँ वे Vice President IT थे) और Jio Platforms में। उनके पास ISB से MBA है।

Disclosure: The Sweet Change के को-फ़ाउंडर

Kapil Groverr

रिव्यूअर
Kapil Groverr · चीफ़ बिज़नेस ऑफ़िसर और को-फ़ाउंडर

IIM लखनऊ के पूर्व छात्र · मार्केटिंग में 18 साल

Kapil Groverr, The Sweet Change के को-फ़ाउंडर और चीफ़ बिज़नेस ऑफ़िसर हैं, जहाँ वे ग्रोथ और मार्केटिंग देखते हैं। उन्हें मार्केटिंग में 18 साल का अनुभव है। हाल में वे Breathe Well-being में वाइस प्रेसिडेंट मार्केटिंग थे, और उससे पहले King Koil में हेड ऑफ़ डिजिटल मार्केटिंग। IIM लखनऊ के पूर्व छात्र, वे हमारी स्वीटनर गाइड और तुलनाएँ लिखते हैं।

Writes about: स्वीटनर गाइड और तुलनाएँ

Disclosure: The Sweet Change के को-फ़ाउंडर

Manvi Agnihotri

मेडिकल रिव्यू
Manvi Agnihotri · CEO और को-फ़ाउंडर

क्लिनिकल न्यूट्रिशन में 12 साल, 11,000 से ज़्यादा मरीज़ · फ़ूड एंड न्यूट्रिशन में M.Sc, सिल्वर मेडलिस्ट

Manvi Agnihotri, The Sweet Change की CEO और को-फ़ाउंडर हैं। उन्होंने फ़ूड एंड न्यूट्रिशन में M.Sc किया है, जिसमें वे सिल्वर मेडलिस्ट रहीं। डायबिटीज केयर प्रोग्राम Breathe Well-being में उन्होंने ब्रांड स्ट्रैटेजी और मरीज़ों व डॉक्टरों को जानकारी देने का काम संभाला। वे हमारे हेल्थ और न्यूट्रिशन पेज लाइव होने से पहले रिव्यू करती हैं।

Writes about: न्यूट्रिशन और फ़ूड साइंस, ब्लड शुगर और डायबिटीज डाइट

Disclosure: The Sweet Change की को-फ़ाउंडर

स्रोत

  1. Park JH, Moon JH, Kim HJ, Kong MH, Oh YH (2020). Sedentary lifestyle: overview of updated evidence of potential health risks. Korean Journal of Family Medicine 41(6):365-373. doi:10.4082/kjfm.20.0165. https://pmc.ncbi.nlm.nih.gov/articles/PMC7700832/
  2. Ekelund U, Steene-Johannessen J, Brown WJ, et al. (2016). Does physical activity attenuate, or even eliminate, the detrimental association of sitting time with mortality? A harmonised meta-analysis of data from more than 1 million men and women. The Lancet 388(10051):1302-1310. doi:10.1016/S0140-6736(16)30370-1. https://doi.org/10.1016/S0140-6736(16)30370-1
  3. Bull FC, Al-Ansari SS, Biddle S, et al. (2020). World Health Organization 2020 guidelines on physical activity and sedentary behaviour. British Journal of Sports Medicine 54(24):1451-1462. doi:10.1136/bjsports-2020-102955. https://doi.org/10.1136/bjsports-2020-102955
  4. Anjana RM, Pradeepa R, Das AK, et al.; ICMR-INDIAB Collaborative Study Group (2014). Physical activity and inactivity patterns in India: results from the ICMR-INDIAB study (Phase-1) [ICMR-INDIAB-5]. International Journal of Behavioral Nutrition and Physical Activity 11:26. doi:10.1186/1479-5868-11-26. https://doi.org/10.1186/1479-5868-11-26
  5. Dunstan DW, Kingwell BA, Larsen R, et al. (2012). Breaking up prolonged sitting reduces postprandial glucose and insulin responses. Diabetes Care 35(5):976-983. doi:10.2337/dc11-1931. https://doi.org/10.2337/dc11-1931
  6. World Health Organization (2024). Physical activity, fact sheet, 26 June 2024. WHO, Geneva. https://www.who.int/news-room/fact-sheets/detail/physical-activity
  7. The Sweet Change (2026). Post-purchase survey of our own buyers. Internal data; percentages are whole-number shares of the buyers who answered each question. https://www.thesweetchange.com/

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